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ईसाईयों बहुत बुरी मौत मारे जाओगे, याद रखना।

रविवार, 23 जुलाई 2017

तुम भारत में ईसाईयत फैलाओगे न???? हम पूरा GLOBE कवर कर लेंगे कुछ ही समय में, देखते रहना।
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भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही।

भारत में सती प्रथा
भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही, रामायण / महाभारत जैसे ग्रन्थ कौशल्या, कैकेई, सुमित्रा, मंदोदरी, तारा, सत्यवती, अम्बिका, अम्बालिका, कुंती, उत्तरा, आदि जैसी बिध्वाओं की गाथाओं से भरे हुए हैं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में सति-प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है. यह प्रथा भारत में इस्लामी आतंक के बाद शुरू हुई थी। ये बात अलग है कि- बाद में कुछ लालचियों ने अपने भाइयों कि सम्पत्ति को हथियाने के लिए अपनी भाभियों की ह्त्या इसको प्रथा बनाकर की थी।
इस्लामी अत्याचारियों द्वारा पुरुषों को मारने के बाद उनकी स्त्रीयों से दुराचार किया जाता था, इसीलिये स्वाभिमानी हिन्दू स्त्रीयों ने अपने पति के हत्यारों के हाथो इज्जत गंवाने के बजाय अपनी जान देना बेहतर समझा था। भारत में जो लोग इस्लाम का झंडा बुलंद किये घूमते हैं, वो ज्यादातर उन वेवश महिलाओं के ही वंशज हैं जिनके पति की ह्त्या कर महिला को जबरन हरम में डाल दिया गया था। इनको तो खुद अपने पूर्वजों पर हुए अत्याचार का प्रतिकार करना चाहिए।
सेकुलर बुद्धिजीवी "सतीप्रथा" को हिन्दू समाज की कुरीति बताते हैं जबकि यह प्राचीन प्रथा है ही नहीं. रामायण में केवल मेघनाथ की पत्नी सुलोचना का और महाभारत में पांडू की दुसरी पत्नी माद्री के आत्मदाह का प्रसंग है। इन दोनो को भी किसी ने किसी प्रथा के तहत बाध्य नहीं किया था बल्कि पति के वियोंग में आत्मदाह किया था।
चित्तौड़गढ़ के राजा राणा रतन सेन की रानी "महारानी पद्मावती" का जौहर विश्व में भारतीय नारी के स्वाभिमान की सबसे प्रसिद्ध घटना है। ऐय्याश और जालिम राजा "अलाउद्दीन खिलजी" ने रानी पद्मावती को पाने के लिए, चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी थी , राजपूतों ने उसका बहादुरी से सामना किया। हार हो जाने पर रानी पद्मावती एवं सभी स्त्रीयों ने , अत्याचारियों के हाथो इज्ज़त गंवाने के बजाय सामूहिक आत्मदाह कर लिया था. जौहर /सती को सर्वाधिक सम्मान इसी घटना के कारण दिया जाता है।
चित्तौड़गढ़, जो जौहर (सति) के लिए सर्वाधिक विख्यात है उसकी महारानी कर्णावती ने भी अपने पति राणा सांगा की म्रत्यु के समय (1528) में जौहर नहीं किया था, बल्कि राज्य को सम्हाला था। महारानी कर्णावती ने सात साल बाद 1535 में बहादुर शाह के हाथो चित्तौड़ की हार होने पर, उससे अपनी इज्ज़त बचाने की खातिर आत्मदाह किया था। औरंगजेब से जाटों की लड़ाई के समय तो जाट स्त्रियों ने युद्ध में जाने से पहले, अपने खुद अपने पति से कहा था कि उनकी गर्दन काटकर जाएँ।
गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने भी अपने पति की म्रत्यु के बाद 15 बर्षों तक शासन किया था। दुर्गावती को अपने हरम में डालने की खातिर जालिम मुग़ल शासक "अकबर" ने गोंडवाना पर चढ़ाई कर दी थी। रानी दुर्गावती ने उसका बहादुरी से सामना किया और एक बार मुग़ल सेना को भागने पर मजबूर कर दिया था। दुसरी लड़ाई में जब दुर्गावती की हार हुई तो उसने भी अकबर के हाथ पकडे जाने के बजाय खुद अपने सीने में खंजर मारकर आत्महत्या कर ली थी।
"सती" का मतलब होता है, अपने पति को पूर्ण समर्पित पतिव्रता स्त्री। सती अनुसूइया, सती सीता, सती सावित्री, इत्यादि दुनिया की सबसे "सुविख्यात सती" हैं और इनमें से किसी ने भी आत्मदाह नही किया था। जिनके घर की औरते रोज ही इधर-उधर मुह मारती फिरती हों, उन्हें कभी समझ नहीं आ सकता कि - अपने पति के हत्यारों से अपनी इज्ज़त बचाने के लिए, कोई स्वाभिमानी महिला आत्मदाह क्यों कर लेती थी।
हमें गर्व है भारत की उन महान सती स्त्रियों पर, जो हर तरह से असहाय हो जाने के बाद, अपने पति के हत्यारों से, अपनी इज्ज़त बचाने की खातिर अपनी जान दे दिया करती थीं। जो स्त्रियाँ अपनी जान देने का साहस नहीं कर सकी उनको मुघलों के हरम में रहना पडा। मुग़ल राजाओं से बिधिवत निकाह करने वाली औरतों के बच्चो को शहजादा और हरम की स्त्रियों से पैदा हुए बच्चो को हरामी कहा जाता था और उन सभी को इस्लाम को ही मानना पड़ता था।
जिस "सती" के नाम पर स्त्री के आत्मबलिदान को "सती" होना कहा जाता है उन्होंने भी पति की म्रत्यु पर नहीं बल्कि अपने मायके में अपने पति के अपमान पर आत्मदाह किया था। शिव पत्नी "सती" द्वारा अपने पति का अपमान बर्दास्त नहीं करना और इसके लिए अपने पिता के यग्य को विध्वंस करने के लिए आत्मदाह करना , पति के प्रति "सती" के समर्पण की पराकाष्ठ माना गया था। इसीलिये पतिव्रता स्त्री को सती कहा जाता है, जीवित स्त्रियाँ भी सती कहलाई जाती रही है।
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ईसाई समुदाय हिंदुओं के विनाश की शपथ लेता है....

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

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जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं.....

रविवार, 2 जुलाई 2017

जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं.....



जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं
सम्मोहन को अंग्रेजी में हिप्नोटिज्म कहते हैं। इस प्राचीन विद्या का एक ओर जहां दुरुपयोग हुआ और हो रहा है, वहीं इस विद्या के माध्यम से लोगों का भला ‍भी किया जा रहा है।
भला करने वालों का अपना स्वार्थ भी उसमें शामिल है। सम्मोहन के बारे में हर कोई जानना चाहता है, लेकिन सही जानकारी के अभाव में वह इसे समझ नहीं पाता है।
सवाल यह उठता है कि क्या सम्मोहन विद्या से किसी भी प्रकार का रोग दूर हो सकता है? क्या सम्मोहन से किसी भी प्रकार की शक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है
और क्या इसके माध्यम से दूसरों को अपने इशारे पर नचाया जा सकता है? सवाल और भी हो सकते हैं लेकिन आखिर सम्मोहन विद्या का सत्य क्या है और क्या है इसका रहस्य?
सम्मोहन विद्या भारतवर्ष की प्राचीनतम और सर्वश्रेष्ठ विद्या है। सम्मोहन विद्या को ही प्राचीन समय से 'प्राण विद्या' या 'त्रिकालविद्या' के नाम से पुकारा जाता रहा है।
कुछ लोग इसे मोहिनी और वशीकरणविद्या भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे हिप्नोटिज्म कहते हैं। हिप्नोटिज्म मेस्मेरिज्म का ही सुधरा रूप है।
यूनानी भाषा हिप्नॉज से बना है हिप्नोटिज्म जिसका अर्थ होता है निद्रा। 'सम्मोहन' शब्द 'हिप्नोटिज्म' से कहीं ज्यादा व्यापक और सूक्ष्म है।
पहले इस विद्या का इस्तेमाल भारतीय साधु-संत सिद्धियां और मोक्ष प्राप्त करने के लिए करते थे। जब यह विद्या गलत लोगों के हाथ लगी तो उन्होंने इसके माध्यम से काला जादू और लोगों को वश में करने का रास्ता अपनाया।
मध्यकाल में इस विद्या का भयानक रूप देखने को मिला। फिर यह विद्या खो-सी गई थी।
आधुनिक युग में भारत की सम्मोहन विद्या पर पश्चिमी जगत ने 18वीं शताब्दी में ध्यान दिया। भारत की इस रहस्यमय विद्या को अर्ध-विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय सर्वप्रथम ऑस्ट्रियावासी फ्रांस मेस्मर को जाता है।
बाद में 19वीं शताब्दी में डॉ. जेम्स ब्रेड ने मेस्मेर के प्रयोगों में सुधार किया और इसे एक नया नाम दिया 'हिप्नोटिज्म'।
इस विद्या का उपयोग ईसाई मिशनरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किया और वे आज भी कर रहे हैं। वे लोगों को बार-बार सुझाव-निर्देश देकर यह विश्वास कराने में कामयाब रहते हैं कि ईसाई धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
वे इसके माध्यम से गरीब मुल्कों के गरीबों में उनका इलाज कर इसे यीशु के चमत्कार से जोड़कर करते हैं। वे चंगाई सभा करके इस विद्या के माध्यम से लोगों को सम्मोहित करते हैं।
मेस्मेरिज्म क्या है : पाश्चात्य डॉक्टर फ्रेडरिक एंटन मेस्मर ने 'एनिमल मेग्नेटिज्म' का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए अनेक व्यक्तियों को रोगों से मुक्त किया था। उनके प्रयोगों को मेस्मेरिज्म कहा जाता है।
मेस्मेरिज्म के प्रयोगों पर जांच बैठाई गई और बाद में इसे खतरनाक मानते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। 1841 में मेस्मेरिज्म के प्रयोगों में सुधार करने और उसमें निहित वैज्ञानिक तथ्यों को उद्घाटित करने और उसे हिप्नोटिज्म के रूप में परिवर्तत करने का श्रेय डॉक्टर जेम्स ब्रेड को जाता है।
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लालू के घर के दरवाजे पे घंटी बजती है....

शुक्रवार, 30 जून 2017

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कान्वेन्ट का अर्थ है नाजायज बच्चों के लिए ।

गुरुवार, 29 जून 2017

कान्वेन्ट का अर्थ 

कान्वेन्ट का अर्थ- 

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द कहाँ से आया है तो आइये प्रकाश डालते हैं ।

ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी  वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना।

जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।

अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाये तब वहाँ की सरकार ने कान्वेन्ट खोले अर्थात जो बच्चे अनाथ होने के साथ साथ नाजायज हैं उनके लिए कान्वेन्ट बने।

उन अनाथ और नाजायज  बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए  उन्होंने अनाथालयो में एक फादर एक मदर एक सिस्टर होती है क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायजा बाप है न माँ है  न बहन है।।

तो कान्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए ।

अब अपनी मूर्खता देखिए जिनके जायजा माँ बाप भाई बहन सब हैं वो कान्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा कान्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं । 

आज जिसे देखो कान्वेन्ट खोल रहा है जैसे बजरंग बली कान्वेन्ट स्कूल,  माँ भगवती कान्वेन्ट स्कूल ।

अब कौन समझाये कि भइया माँ भगवती या बजरंग बली का कान्वेन्ट से क्या लेना देना।

मै सभी महानुभावो से निवेदन करता हूँ कि अपने बच्चों को इसाई बनने से बचाये…………

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लड़कियो के नग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रीया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो....उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???

बुधवार, 14 जून 2017
लड़कियो केे नग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रीया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो....उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???1)हम सोच क्यों बदले?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपने लोगो की सोच का ठेका लिया है क्या??2) आप उन लड़कियो की सोच का आकलन क्यों नहीं करते?? उसने क्या सोचकर ऐसे कपडे पहने की उसके स्तन पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे,वही एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उस देखे3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये.....हत्या,डकैती,चोरी,बल
ात्कार,आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों????4) कुछ लड़किया कहती है कि हम क्या पहनेगे ये हम तय करेंगे....पुरुषनहीं.....जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करे....लेकिन हम पुरुष भी किस लड़की का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रीया नहीं.... और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे5)फिर कुछ विवेकहीन लड़किया कहती है कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की.....जी बिल्कुल आज़ादी है,ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो,गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो,वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो,पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो।6) फिर कुछ नास्तिक स्त्रीया कुतर्क देती है की जब नग्न काली की पूजा भारत में होती है तो फिर हम औरतो से क्या समस्या है??पहली बात ये की काली से तुलना ही गलत है।।और उस माँ काली कासाक्षात्कार जिसने भी किया उसने उसे लाल साडी में ही देखा....माँ काली तो शराब भी पीती है....तो क्या तुम बेवड़ी लड़कियो की हम पूजा करे?? काली तो दुखो का नाश करती है....तुमलड़किया तो समाज में समस्या जन्म देती हो...... और काली से ही तुलना क्यों??? सीता पारवती से क्यों नहीं?? क्यों न हम पुरुष भी काल भैरव से तुलना करे जो रोज कई लीटर शराब पी जाते है???? शनिदेव से तुलना करे जिन्होंने अपनी सौतेली माँ की टांग तोड़ दी थी।7)लड़को को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा की क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे??? क्या ये लड़किया पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से देखती है ??? जब ये खुद पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की "हमें माँ/
बहन की नज़र से देखो"कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती है??? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था....सत्य ये है कीअश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।।और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करता है।मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता(सेक्स)भी है।चाणक्य ने चाणक्य सूत्र में सेक्स को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है।।अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रीया अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती????गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।।
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porn_industry ये victorians ने शुरू किया था.... हां वो ही राजपरिवार वाले... बाद में पूरी दुनिया को brothels + strip club दे दिये

बुधवार, 14 जून 2017
( धनमाफिया ) #ईलू_बाबा_porn_industry ये victorians ने शुरू किया था.... हां वो ही राजपरिवार वाले... बाद में पूरी दुनिया को brothels + strip club दे दिये. - - - भारत में अंग्रेजो ने ही sonagachi - Bengal (Asia's second largest red light) बसाया था. ... दुनिया का 85% Internet porn Chatsworth, callifornia से आता है... ये Illuminati ( धनमाफियाओ )) के weaponless war के मुख्य हथियारों में से है.... समाज को Free porn उपलब्ध करा कर एक तीर से कईशिकार हो रहे हैं. आखिर ये Free कयो है? और attractive कैसे बनाया गया है?, दरअसल, system को यौन-चकाचौंध से भरा गया है.. ये Industry जितनी मजेदार लगती है उतनी है नही. दूर के ढोल सुहावने होते हैं. यकीन करने के लिए pink crossfoundation की chief " Shelly lubben" से पूछ लें.... ... किसी भी देश को तोडने के लिये उसको बस नग्नता दे दो. फिर वहां का youth अपने बाप की भी नही सुनेगा... बाकी का काम मैकाले ब्रांड सिस्टम ने कर ही दिया है... अब गांजा + Marijuana + alcohol से youth बोर हो गया तो धंधा बैठ जायेगा. फिर क्या, drugs + free porn = non curable addiction वाला principle अपनाया... Hollywood के बाद bollywood सबसे बडा अड्डा है porn industry का. सबसे ज्यादा "drug-usage" porn industry मे होती है. सब interconnected हैं. Drug dealing = human trafficking, या ये कहें कि कि दोनो एक दूसरे के पूरक. बिना नशे के porn movie बनती नही. American companies के condom को बिकवाने में बॉलिवुड का बहुत बड़ा योगदान है... दरअसल, Bollywood में Theory of relativity of time लग गया. मतलब कि जिस bollywood को 50-60s में घर घर जाकर भी कोई अभिनेत्री नही मिलती थी और 70-80s में kiss sceneपर बवाल मच गया था, क्योंकि तब अभिनेत्रियों को बाजारू बोला जाता था, वो ही bollywood आज संभोग के scene बिना रोकटोक दिखाता है... मुंबई में Line लगी है मैकाले ब्रांड लडकियों की. Casting couch धडाधड होते हैं. जो जितना"compromise" करेगी उतनी बढिया movie-serial मिलेगा. लग गयी ना time-relativityTheory? समय समय की बात है. ईलू बाबा के Main principles में ये hypnotism type atmosphere भी है. जिससे- - - 1- भारत में नग्नता + rape% बढेगा. (जैसा ईलू ने misconception फैलाया था अफ्रीका में कि sex with virgins = aids curable. 2- drugs जो दिल्ली-मुंबई के अमीरजादे नोट जलाकर सूंघते हैं, वो हर नुक्कड़ पर बिकेगा. 3- भयंकर सामाजिक पतन होगा. 4- ईलू का बनाया हुआ HIV-AIDS का graph बहुत ऊपर जायेगा. 5- Aids की सालों से बन रही महंगी दवाइयों का यहां use होगा और viagra तो normal बिकेगी kit Kat की तरह. 6- जैसा कि पहले मैने बहुत बार कहा है war (weapons) + virus (medicine) = illuminati's economy. 8- मलेच्छों के झुंड में honey Singh और Sunny Leon का नाम बहुत ऊपर है. 9- बालीवुडिया वेश्याओं की लौटरी लग गयी है ईलू बाबा की किरपा से. 10- सस्ते मोबाइल + Free porn = conspiracyहै बहुत बडी. मोदी ने झाडू तो उठा लिया लेकिन ये कचरा नहीं दिखा उन्हें. (जैसे कत्लखानो रूपी कचरा नही दिखा). साफ करना है तो देश से porn industry + slaughter house को साफ करो, ये सडकें साफ करने से क्या देश चलेगा?.. लेकिन ये सफाई इनके "आका" नही होने देंगे.... दो साल पहले हमारे देश की चूतिया पब्लिक sex education के support में थी. जिसमें "आका" का शासन नही है जैसे North Korea में, वहां punishment "मौत" है porn देखने का, बनाना तो दूर की बात है. यहां भी कुछ चूतियो को Democracy चाहिये. याद रखना, Maclauy educational system + illuminati porn industry = biggest threat है भारत के भविष्य के लिए
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जीसस के MILLIONS OF ANGELS SENT BY JESUS जो भोसडीके आकाश में उड़ रहे हैं आखिर वो कर क्या रहे हैं, मुझे लगता है नई नवेली बानी हुई नन्स का ऊपर से boobs देखते हैं। बाकी और तो कुछ कर नही सकते न।

रविवार, 11 जून 2017

हिन्दुओं के 33 प्रकार के देवी देवताओं से ईसाइयों के विशेष अंगों में  जलन होती है लेकिन ये अपने जीसस के MILLIONS OF ANGELS SENT BY JESUS जो भोसडीके आकाश में उड़ रहे हैं आखिर वो कर क्या रहे हैं, मुझे लगता है नई नवेली बानी हुई नन्स का ऊपर से boobs देखते हैं। बाकी और तो कुछ कर नही सकते न।
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ये ईसाई जीससचोद हिंदुओं को एरा गेरा समझ है क्या बे ??? मरीयम के बलात्कार से पैदा हुए ईसाइयों औकात में आओ...अल्लाहचोद

शुक्रवार, 9 जून 2017

ये ईसाई जीससचोद हिंदुओं को एरा गेरा समझ है क्या बे ??? मरीयम के बलात्कार से पैदा हुए ईसाइयों औकात में आओ...अल्लाहचोद
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मेक्सिको में 30 बच्चियों का बलात्कार करके जीसस पैदा करने की कोसिस की गई।

गुरुवार, 11 मई 2017

मेक्सिको में 30 बच्चियों का बलात्कार करने वाले पादरी को वैटिकन चर्च ने किया माफ़



सनातन ग्रन्थों में एक श्लोक है जो वेदों से लिया गया है -- "अवश्यमेव भोगतव्यम , कृतं कर्म शुभाशुभम" (पाप क्षमा नहीं होते , अपने किये का दंड हर हाल में भोगना पड़ता है ) 


इस वैदिक सिद्धांत के बिल्कुल उलट एक मामला तब देखने को मिला जब ईसाईयों की सर्वोच्च प्रार्थना स्थल चर्च वेटिकन सिटी चर्च ने एक चर्च में रहने वाले उस पादरी को माफी दे दी जिसने खुद अपने मुँह से अपने भीषण कुकृत्य को स्वीकार करते हुए 30 बच्चियों से बलात्कार करना स्वीकार किया था और जिस व्याभिचारी आदत के चलते उसे एड्स भी हो चुका था ... 


मामला है दक्षिण मैक्सिको के ओक्साका का जहां एक चर्च का पादरी जोस गार्सिया अतालफो एक चर्च में बतौर फादर रहता था .. उसने अपने भेद को खुलने से पहले 30 बच्चियों के बलात्कार की बात को खुद कबूला और उसे सब के आगे स्वीकार भी किया .. 


पादरी की हवस का शिकार बनी एक बच्ची की माँ ने जब अपनी बलात्कार पीड़िता बच्ची को न्याय दिलाने के लिए पुलिस और न्यायालय का सहारा लिया तो चर्च के भीषण दबाव में कोई साहस नहीं कर पाया उस पादरी पर कार्यवाही करने का , थक हार कर वो दुखी मां सर्वोच्च चर्च वेटिकन सिटी पहुँची पर वहां भी उसे मिली तो सिर्फ और सिर्फ निराशा .. 


वेटिकन सिटी में उस बलात्कारी फादर ने दया की भीख मांगी और अपनी बीमारी का हवाला दिया जिस पर चर्च वेटिकन सिटी ने उस बलात्कारी पादरी को क्षमादान देते हुए मुक्त कर दिया और बलात्कार पीड़ित की माँ को न्याय मिलने के सारे सपने तोड़ डाले ... 


अब वो सारी बलात्कार पीड़िताएं बच्चियाँ और उनके माता पिता पूरी तरह लाचार हैं क्योंकि अब उनके पास इस से आगे अपील करने का कोई स्थान भी नहीं हैं ...

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ईसाई गुर्गे पुरे देश से हिन्दुओ और भारतीय संस्कृति को कर रहे है खत्म।

बुधवार, 3 मई 2017

ईसाई गुर्गे पुरे देश से हिन्दुओ और भारतीय संस्कृति को कर रहे है खत्म।


जिहादी तत्व तो आतंक मचाये हुए है चाहे वो कश्मीर हो, केरल हो, बंगाल, हो यूपी हो या देश के अन्य

हिस्से हो, पर धूर्त ईसाई मिशनरियां बड़ी ही ख़ामोशी से हिन्दुओ और भारतीय संस्कृति को पुरे देश से

साफ़ कर रही है

ईसाई मिशनरियां रोम और अन्य ईसाई देशों से पैसा प्राप्त करती है

और ये लोग हिन्दुओ के धर्मान्तरण के लिए अलग अलग प्रपंच करते ही रहते है, उत्तर पूर्व को इन ईसाई गुर्गों ने हिन्दुओ को लगभग पूरा साफ़ ही कर दिया है

1941 तक पुरे उत्तर पूर्व में 1 भी ईसाई नहीं था, पर आज पूरा उत्तर पूर्व ही ईसाई बाहुल्य हो चूका है

सेक्युलर और वामपंथी नेताओं का ईसाई गुर्गों को पूरा संरक्षण प्राप्त है

और इस देश की सबसे बड़ी ईसाई मिशनरी तो स्वयं कांग्रेस पार्टी है और जिसकी सरगना इटालियन सोनिया गाँधी है

ये ईसाई मिशनरियां इतनी धूर्त है की, गरीब हिन्दुओ को धर्मान्तरित करने के लिए अलग अलग प्रपंच करती है।

जीजस को कभी कृष्णा के रूप में दिखा देते है

सूर्य नमस्कार की जगह जीजस नमस्कार चला रहे है ये लोग केरल में, केरल में ईसाई अब 22% हो चुके है

केरल ही नहीं पुरे देश के अलग अलग हिस्सों में ये ऐसे ही प्रपंच चलाते है, ये लोग मुख्यतः सेक्युलर हिन्दुओ का शिकार करते है, इनके स्कूलों में बड़े पैमाने पर सेक्युलर हिन्दुओ और उनके बच्चों

को हिन्दुओ से घृणा का पाठ पढ़ाया जाता है, और ईसाइयत को बढ़ावा दिया जाता है

आज हमारे देश में जितने भी सेक्युलर है उनमे से अधिकतर इन ईसाई स्कूलों में ही पढ़े है, उदाहरण के लिए

बरखा दत्त, वो भी ईसाई स्कुल में ही पढ़ी है

ईसाई मिशनरियां पुरे देश से धीरे धीरे हिन्दुओ और साथ ही साथ भारतीय संस्कृति को साफ़ कर रही है

और अधिक दुर्भाग्य ये है की, देश के अधिकतर लोग जागरूक भी नहीं है

और वो इन ईसाई मिशनरियों के झांसे में बड़ी जल्दी आ भी जाते है

जरुरत है की देश के जागरूक लोग देश के अन्य लोगों को जागरूक करें, अन्यथा इन देश में न रहेगा हिन्दू

और लुप्त ही हो जाएगी हमारी भारतीय संस्कृति

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*ईसाई धर्मान्तरण: एक विश्लेषण*

शनिवार, 29 अप्रैल 2017
■ *ईसाई धर्मान्तरण: एक विश्लेषण* ■ ( by डॉ विवेक आर्य )
                         ●●●●●
मेरे एक मित्र ने ईसाई मत की प्रचारनीति के विषय में मुझसे पूछा। ईसाई समाज शिक्षित समाज रहा है। इसलिए वह कोई भी कार्य रणनीति के बिना नहीं करता। बड़ी सोच एवं अनुभव के आधार पर ईसाईयों ने अपनी प्रचार नीति अपनाई है। ईसाईयों के धर्मान्तरण करने की प्रक्रिया तीन चरणों में होती हैं। 

◆ प्रथम चरण Inculturation अर्थात संस्कृतीकरण
◆ दूसरा चरण expansion अर्थात विस्तार 
◆ तृतीय चरण domination अर्थात प्रभुत्व 

अंग्रेजी भाषा का एक शब्द है Inculturation अर्थात संस्कृतीकरण।  इस शब्द का प्रयोग ईसाई समाज में अनेक शताब्दियों से होता आया है। सदियों पहले ईसाई पादरियों ने ईसाइयत को बढ़ावा देने के लिए "संस्कृतीकरण" रूपी योजना का प्रयोग करना आरम्भ किया था। इसे हम साधारण भाषा में समझने का प्रयास करते है। 

*1. प्रथम चरण* में एक बाग में पहले एक बरगद का छोटा पौधा लगाया जाता है। वह अपने अस्तित्व के  संघर्ष करता हुआ किसी प्रकार से अपनी रक्षा कर वृद्धि करने का प्रयास करता है। उस समय वह छोटा होने के कारण अन्य पोधों के मध्य अलग थलग सा नहीं दीखता। 

*2. अगले चरण* में वह पौधा एक छोटा वृक्ष बन जाता है। अब वह न केवल अन्य पौधों से अधिक मजबूत दीखता है अपितु अपने हक से अपना स्थान घेरने की क्षमता भी अर्जित कर लेता है। अन्य पौधों से खाद,सूर्य का प्रकाश, पानी और स्थान का संघर्ष करते हुए वह उन पर विजय पाने की चेष्टा करता हुआ प्रतीत होता हैं। 

*3. अंतिम चरण* में वह एक विशाल वृक्ष बन जाता है। उसकी छांव के नीचे आने वाले सभी पौधे संसाधनों की कमी के चलते या तो उभर नहीं पाते अथवा मृत हो जाते हैं। उसका एक छत्र राज कायम हो जाता हैं। अब वह उस बाग़ का बेताज बादशाह होता है।     

ईसाई समाज में धर्मान्तरण भी इन्हीं तीन चरणों में होता है। 
 
*पहले चरण* संस्कृतिकरण में एक गैर ईसाई देश में ईसाइयत के वृक्ष का बीजारोपण किया जाता है। ईसाई मत की मान्यताएं, प्रतीक, सिद्धांत, पूजा विधि आदि को छुपा कर उसके स्थान पर स्थानीय धर्म की मान्यताओं को ग्रहण कर उनके जैसा स्वरुप धारण किया जाता है। जैसे भारत के उदहारण से इसे समझने का प्रयास करते है। 

*1. वेशभूषा परिवर्तन-* ईसाई पादरी पंजाब क्षेत्र में सिख वेश पगड़ी बांध कर, गले में क्रोस लटका कर प्रचार करते है। हिंदी भाषी क्षेत्र में हिन्दू साधु का रूप धारण कर, गले में रुदाक्ष माला में क्रोस डालकर प्रचार करते है। दक्षिण भाषी क्षेत्र में दक्षिण भारत जैसे परिधान पहनकर प्रचार करते है। 

*2. प्रार्थना के स्वरुप में परिवर्तन-* पहले ॐ नम क्रिस्टाय नम। ॐ नम माता मरियमय नम। जैसे मनघड़त मन्त्रों का अविष्कार किया जाता है। फिर प्रार्थना गीत आदि लिखे जाते है जिनमें संस्कृत, हिंदी अथवा स्थानीय भाषा का उपयोग कर ईसा मसीह की स्तुति की जाती हैं। जिससे गाने पर यह केवल एक धार्मिक विधि लगे। 

*3. त्योहार विधि में परिवर्तन-* स्थानीय त्योहार के समान ईसाई त्योहारों जैसे गुड फ्राइडे, क्रिसमस आदि का स्वरुप बदल दिया जाता है। जिसे वह स्थानीय त्योहारों के समान दिखे। कोई गैर ईसाई इन त्योहारों में शामिल हो तो उसे अपनापन लगे। 

*4. चर्च की संरचना में परिवर्तन-* पंजाब में अगर चर्च बनाया जाता है  गुरुद्वारा जैसा दिखे, हिंदी भाषी क्षेत्र में किसी हिन्दू मंदिर के समान दिखे, दक्षिण भारत में किसी दक्षिण भारतीय शैली जैसा दिखे। चर्च के बाहरी रूप को देखकर हर कोई यह समझे की यह कोई स्थानीय मंदिर है। ऐसा प्रयास किया जाता है।   

*5. साहित्य निर्माण-* क्रिस्चियन योग, ईसाई ध्यान पद्यति, ईसाई पूजा विधि, ईसाई संस्कार आदि साहित्य के शीर्षकों को प्रथम चरण में प्रकाशित करता हैं। यह  स्थानीय मान्यताओं के साथ अपने आपको मिलाने का प्रयास  होता है। अगले चरण में चर्च स्थानीय भाषा में दया, करुणा, एकता, समानता, ईसा मसीह के चमत्कार, प्रार्थना का फल, दीन दुखियों की सेवा करने वाला साहित्य प्रकाशित करता हैं। इस चरण का प्रयास अपनी मान्यताओं को पिछले दरवाजे से स्वीकृत करवाना होता है। यीशु मसीह को किसी हिन्दू देवता एवं मरियम को किसी हिन्दू देवी के रूप में चित्रित करना चर्च के लिए आम बात है। भोले भाले लोगों को भ्रमित करने की यह कला चर्च के संचालकों से अच्छा कोई नहीं जानता। 

इस चरण में गैर ईसाई क्षेत्रों में पादरियों की बकायदा मासिक वेतन देकर नियुक्ति होती है। उनका काम दिन-दुखियों की सेवा करना, बीमारों के लिए प्रार्थना करना, चंगाई सभा करना, रविवार को प्रार्थना सभा में शामिल होने के लिए स्थानीय लोगों को प्रेरित करना होता हैं। इस समय बेहद मीठी भाषा में ईसा मसीह के लिए भेड़ों को एकत्र करना एकमात्र लक्ष्य होता है। यह कार्य स्थानीय लोगों के माध्यम घुलमिलकर किया जाता है। जिससे किसी को आपके पर शक न हो। जितने अधिक धर्म परिवर्तन का लक्ष्य पूर्ण होता है उतना अधिक अनुदान ऊपर से मिलता है। यह कार्य शांतिपूर्वक, चुपचाप, बिना शोर मचाये किया जाता हैं।इस प्रकार से प्रथम चरण में स्थानीय संस्कृति के समान अपने को ढालना होता है। इसीलिए इसे संस्कृतिकरण कहते है। हमारे देश में दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, जम्मू कश्मीर, बंगाल आदि राज्य इस चरण के अंतर्गत आते हैं। जहाँ पर चर्च बिना शोर मचाये गरीब बस्तियों में विशेष रूप से दलितों को प्रलोभन आदि देकर उनका धर्म परिवर्तन करने में लगा हुआ है।  

*द्वितीय चरण* में विस्तार होता है। छोटा चर्च अब एक बड़ा बन जाता है। उसका विस्तार हो जाता है। अब वह छुप-छुप कर नहीं अपितु आत्म विश्वास से अपनी उपस्थिती दर्ज करवाता है। 

*1. स्थानीय सभा के स्वरुप में परिवर्तन*- अब वह हर रविवार को आम सभा में लाउड स्पीकर लगाकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाता है। अनेक लोग सालाना ईसाई बनने लगते है। अब उसके पादरी ईसाई मत की क्यों श्रेष्ठ है और पगान स्थानीय देवी देवता क्यों असफल हैं। ऐसी बातें चर्च की दीवारों के भीतर खुलेआम बिना रूकावट के बोलने लगते है। न केवल उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता है। अपितु वह धीरे धीरे आक्रामक भी होने लगते है। कुछ अंतराल में बड़ी बड़ी चंगाई सभाओं का आयोजन चर्च करता है। पूरे शहर में पोस्टर लगाए जाते है। स्थानीय टीवी पर उसका विज्ञापन दिया जाता है। दूर दूर से ईसाईयों को बुलाया जाता है। विदेशी मिशनरी भी अनेक बार अपनी गोरी चमड़ी का प्रभाव दिखाने के लिए आते है। 

*2. चर्च के साथ मिशनरी स्कूल /कॉलेज का खुलना*- अब चर्च के साथ ईसाई मिशनरी स्कूल खुल जाता है।  उस  स्कूल में हिन्दुओं के बच्चे मोटी मोटी फीस देकर अंग्रेज बनने आते हैं। उन बच्चों को रोज अंग्रेजी में बाइबिल की प्रार्थना करवाई जाती है।  ईसा मसीह के चमत्कार की कहानियां सुनाई जाती हैं। देश में ईसाई समाज की गतिविधियों के लिए दान कहकर धन एकत्र किया जाता है।  जो हिन्दू बच्चा सबसे अधिक धन अपने माँ-बाप से खोस कर लाता है। उसे प्रेरित किया जाता है। जो नहीं लाता उसे नजरअंदाज अथवा तिरस्कृत किया जाता हैं। कुल मिलाकर इन ईसाई कान्वेंट स्कूल से निकले बच्चे या तो नास्तिक अथवा ईसाई अथवा हिन्दू धर्म की मान्यताओं से घृणा करने वाले अवश्य बन जाते हैं। इसे आप का जूता आप ही के सर बोले तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। 

*3. बिज़नेस मॉडल*- चर्च अब धर्म परिवर्तित हिन्दुओं को अपने यहाँ रोजगार देने लगता है। चर्च शिक्षा, स्वास्थ्य,अनाथालय, NGO आदि के नाम पर विभिन्न उपक्रम आरम्भ करता है। चपरासी, वाहन चालक से लेकर अध्यापक , नर्स से लेकर अस्पताल कर्मचारी, प्रचारक से लेकर पादरी की नौकरियों में उनकी नियुक्ति होती हैं।  कुल मिलाकर यह एक बिज़नेस मॉडल के जैसा खेल होता हैं। धर्म परिवर्तित व्यक्ति  को इस प्रकार से चर्च पर निर्भर कर दिया जाता है कि अब उसे न चाहते हुए भी चर्च की नौकरी करनी पड़ती हैं। अन्यथा वह भूखे मरेगा। जिससे धर्म परिवर्तित वापिस जाने का न सोचे। यह मॉडल विश्व में अनेक स्थानों पर आजमाया जा चूका हैं। 

*4. बाइबिल कॉलेज-* चर्च अपने यहाँ पर धर्म परिवर्तित ईसाईयों के बच्चों को चर्च द्वारा स्थापित Theology अर्थात धार्मिक शिक्षा देने वाले विद्यालयों में भर्ती करवाने के लिए प्रेरित करता हैं। इस उद्देश्य दूसरी पीढ़ी को अपने पूर्वजों की जड़ों से पूरी प्रकार से अलग करना होता हैं। इन विद्यालयों में वे बच्चे पढ़ने जाते है जिनके माता-पिता में हिन्दू धर्म के संस्कार होते है। उनके बच्चें एक सच्चे ईसाई के समान सोचे और वर्ते। हिन्दू देवी-देवताओं और मान्यताओं पर कठोर प्रहार करे और ईसाई मत का सदा गुणगान करे। ऐसा उनकी मानसिक अवस्था को तैयार किया जाता है। इन  Theology कॉलेजों से निकले बच्चे ईसाइयत का प्रचाररात-दिन करते हैं। 

*5. पारिवारिक कलह -* ईसाई चर्च इस कला में माहिर है। जिस परिवार का कोई सदस्य ईसाई बन जाता है तथा अन्य सदस्य हिन्दू बने रहते है। वह घर झगड़ों का घर बन जाता हैं। शुरू में वह ईसाई सदस्य सभी सदस्यों को ईसाई बनने का दबाव बनता हैं। घर के कार्यों में सहयोग न करना। हिन्दू त्योहारों को बनाने का विरोध करना। हिन्दू देवी देवताओं की निंदा करना। अपनी क्षमता से अधिक दान चर्च को देना। अपनी पत्नी और बच्चों को ईसाई न बनने पर संसाधनों से वंचित करना। अपने माँ-बाप को ईसाई न बनने के विरोध में सुख सुविधा जैसे भोजन, कपड़े, चिकित्सा सुविधा आदि न देना। यह कुछ उदहारण है। अपना एक अनुभव साँझा कर रहा हूँ। बात 2003 की है। मैं कोयम्बटूर तमिल नाडु में MBBS का छात्र था। मेरे समक्ष  एक परिवार जो ईसाईयों के पेंटाकोस्टल सम्प्रदाय से था। अपने मरीज का ईलाज करवाने आया। इस ईसाई सम्प्रदाय में दवा के स्थान पर रोगी का ईसा मसीह की प्रार्थना से चंगा होने को अधिक मान्यता दी जाती है। उस परिवार का मुखिया अन्य सदस्यों के न चाहते हुए भी अस्पताल से एक गंभीर रोगी की छुट्टी करवाकर चंगाई प्रार्थना करवाने के लिए चर्च ले गया। रोगी का क्या हुआ होगा सभी समझ सकते है। जो ईसाई यह लेख पढ़ रहे है। वे कृपया आत्मचिंतन करे क्या परिवारों को उजाड़ना यीशु मसीह का कार्य है?
 
इस दूसरे चरण में तमिलनाडु, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, पंजाब आदि राज्य आते है।  इन राज्यों में सरकारें चर्च की गतिविधियों  की अनदेखी करती है। क्यूंकि वह चर्च के कार्यों में फालतू हस्तक्षेप करने से बचती है। सरकार की नाक के नीचे यह सब होता है मगर वह कुम्भकर्णी नींद में सोती रहती हैं।  

*तीसरे चरण* में चर्च एक विशाल बरगद बन जाता है। इस चरण को "प्रभुत्व" का चरण कहते है। इस चरण में ईसाई मत का गैर ईसाईयों के प्रति वास्तविक सोच के दर्शन होते है। चर्च के लिए इस चरण में जायज और नाजायज के मध्य कोई अंतर नहीं रहता। वह उसका साम-दाम दंड भेद से अपने उद्देश्य को लागु करने के लिए किसी भी हद तक जाता है। 

*1. हिंसा का प्रयोग* - उड़ीसा में ईसाई धर्म परिवर्तन का विरोध करने वाले स्वामी लक्ष्मणानंद जी की हत्या करना भी इसी नीति के अंदर आता हैं। उत्तर पूर्वी राज्य त्रिपुरा में रियांग जनजाति बस्ती थी। उस जनजाति ने ईसाई बनने से इंकार कर दिया। उनके गावों पर आतंकवादियों द्वारा हमला किया गया।  उन्हें हर प्रकार से आतंकित किया गया। ताकि वह ईसाई बन जाये। मगर रियांग स्वाभिमानी थे। वे अपने पूर्वजों की धरती छोड़कर आसाम में आकर अप्रवासी के समान रहने लगे। मगर धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया। खेद है कि कोई भी मानवाधिकार संगठन ईसाईयों के इस अत्याचार की सार्वजानिक मंच से कभी निंदा नहीं करता।  

*2. सरकार पर दबाव-* अपने संख्या बढ़ने पर ईसाई समाज एकमुश्त वोट बैंक बन जाता है। चुनाव के दौर में राजनीतिक पार्टियों के नेता ईसाई बिशप के चक्कर लगाते है। बहुत कम लोग यह जानते है कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने तो मिजोरम में भारतीय संविधान के स्थान पर बाइबिल के अनुसार राज्य चलाने की सहमति प्रदान की थी। पंजाब जैसे राज्य में सरकार द्वारा धर्म परिवर्तित ईसाईयों के लिए सरकारी नौकरियों में एक प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। मदर टेरेसा दलित ईसाइयों के आरक्षण के समर्थन में दिल्ली पर धरने में बैठ चुकी है। (कमाल है धर्म परिवर्तन करने के पश्चात भी दलित दलित ही रहते हैं। ) केरल और उत्तर पूर्व में राजनीतिक पार्टियों के टिकट वितरण में ईसाई बहुल इलाकों में चर्च की भूमिका सार्वजानिक हैं। गोवा जैसे राज्य में कैथोलिक चर्च के समक्ष बीजेपी जैसी पार्टियां भी बीफ जैसे मुद्दों पर चुप्पी धारण कर लेती हैं। तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता द्वारा पहले धर्म परिवर्तन के विरोध में कानून बनाने फिर ईसाई चर्च के दबाव में हटाने की कहानी अभी ज्यादा दिन पुरानी बात नहीं हैं। नियोगी कमेटी द्वारा प्रलोभन देकर जनजातियों और आदिवासियों को ईसाई बनाने के विरोध में सरकार को जागरूक करने का कार्य किया गया था। उस रिपोर्ट पर सभी सरकारें बिना किसी कार्यवाही के चुप रहना अधिक श्रेयकर समझती हैं। मोरारजी देसाई के कार्यकाल में धर्म परिवर्तन के विरोध में विधेयक पेश होना था। उस विधेयक के विरोध में मदर टेरेसा ने हमारे देश के प्रधानमंत्री को यह धमकी दी कि अगर ईसाई संस्थाओं पर प्रतिबन्ध लगाया गया, तो वे अपने सभी सेवा कार्य स्थगित कर देंगे। इस पर देसाई जी ने प्रतिउत्तर दिया कि इसका अर्थ तो यह हुआ कि ईसाई समाज सेवा की आड़ में धर्मान्तरण करने का अधिक इच्छुक है।  सेवा तो केवल एक बहाना मात्र है। खेद है कि मोरारजी जी की सरकार जल्दी ही गिर गई और यह विधेयक पास नहीं हुआ। इस प्रकार से ईसाई चर्च अनेक प्रकार से सरकार पर दबाव बनाता है। 

*3. गैर ईसाईयों के घरों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष-* ईसाई समाज से सम्बंधित नौजवान लड़के-लड़कियों को ईसाइयत के प्रति समर्पण भाव बचपन से सिखाया जाता हैं। पाश्चात्य संस्कृति से प्रभावित होने के कारण उनका आपस में वार्तालाप चर्च के परिसर में, युथ प्रोग्राम में, बाइबिल की कक्षाओं में, गर्मियों के कैंप में, गिटार/संगीत सिखाने की कक्षाओं में आरम्भ हो जाता हैं। इस कारण से अनेक युवक युवती आपस में विवाह भी बहुधा कर लेते है। इसके साथ साथ वे अपने कॉलेज में पढ़ने वाले गैर हिन्दू युवक-युवतीयों से भी विवाह कर लेते हैं। इस अंतर धार्मिक विवाह को कुछ लोग सेक्युलर सामाज का अभिनव प्रयोग चाहे कहना चाहे। मगर इस सम्बन्ध का एक अन्य पहलू भी है। वह है प्रभुत्व। ईसाई युवती अगर किसी हिन्दू युवक से विवाह करती है तो वह ईसाई रीति-रिवाजों, चर्च जाने, बाइबिल आदि पढ़ने का कभी त्याग नहीं करती। उस विवाह से उत्पन्न हुई संतान को भी वह यही संस्कार देने का पूरा प्रयत्न करती है। वही अगर ईसाई युवक किसी हिन्दू लड़की से विवाह करता है,  तो वह अपनी धार्मिक मान्यताओं को उस पर लागु करने के लिए पूरा जोर लगाता है। जबकि गैर ईसाई युवक- युवतियां अपनी धार्मिक मान्यताओं को लेकर न इतने प्रबल होते और न ही कट्टर होते है। इस प्रभुत्व की लड़ाई में गैर ईसाई सदस्य बहुधा आत्मसमर्पण कर देते हैं। अन्यथा उनका घर कुरुक्षेत्र न बन जाये। धीरे धीरे वे खुद ही ईसाई बनने की ओर चल पड़ते है। ईसाई समाज के लड़के-लड़कियां हिन्दू समाज के प्रबुद्ध वर्ग जैसे डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत युवक-युवतियों से ऐसा सम्बन्ध अधिकतर बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दूरगामी परिणाम  पर बहुत कम लोगों की दृष्टि जाती हैं। कम शब्दों में हिन्दू समाज की आर्थिक, सामाजिक, नैतिक प्रतिरोधक क्षमता धीरे धीरे उसी के विरुद्ध कार्य करने लगती हैं। पाठक स्वयं विचार करे।  यह कितना चिंतनीय विषय है। 

*4. व्यापार नीति*- बहुत कम लोग जानते है कि संसार के प्रमुख ईसाई देशों के चर्च व्यापार में भारी भरकम धन का निवेश करते हैं। चर्च ऑफ़ इंग्लैंड ने बहुत बड़ी धनराशि इंग्लैंड की बहुराष्ट्रीय कंपनियों में लगाई हुई है। यह विशुद्ध व्यापार है। यह एक प्रकार का चर्च और व्यापारियों का गठजोड़ है। इन कंपनियों से हुए लाभ को चर्च धर्मान्तरण के कार्यों में व्यय करता है। जबकि व्यापारी वर्ग के लिए चर्च धर्मान्तरित नये उपभोक्ता तैयार करता है। एक उदहारण लीजिये चर्च के प्रभाव से एक हिन्दू धोती-कुर्ता छोड़कर पैंट-शर्ट-कोट-टाई पहनने लगता है। व्यापारी कंपनी यह सब उत्पाद बनाती है। चर्च नये उपभोक्ता तैयार करता है। उसे बेचकर मिले लाभ को दोनों मिलकर प्रयोग करते हैं। यह प्रयोग अनेक शताब्दियों से संसार के अनेक देशों में होता आया हैं। प्रभुत्व के इस चरण में अनेक छोटे देशों की आर्थिक व्यवस्था प्रत्यक्ष रूप में इस प्रकार से बहुराष्ट्रीय कंपनियों और परोक्ष रूप से चर्च के हाथों में आ चुकी हैं। यह प्रक्रिया हमारे देश में भी शुरू हो चुकी हैं। इसका एकमात्र समाधान स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक प्रयोग हैं। 
 
*5. सांस्कृतिक अतिक्रमण-* विस्तार चरण में चर्च सांस्कृतिक अतिक्रमण करने से भी पीछे नहीं हटता। वह उस देश की सभी प्रचीन संस्कृतियों को समूल से नष्ट करने का संकल्प लेकर यह कार्य करता हैं। आपको कुछ उदहारण देकर समझाते है। केरल में कथकली नृत्य के माध्यम से रामायण के प्रसंगों का नाटक रूपी नृत्य किया जाता था। ईसाई चर्च ने कथकली को अपना लिया मगर रामायण के स्थान पर ईसा मसीह के जीवन को प्रदर्शित किया जाने लगा। तमिलनाडु में भरतनाट्यम नृत्य के माध्यम से नटराज/ शिव की पूजा करने का प्रचलन है। चर्च ने भरतनाट्यम के माध्यम से माता मरियम को सम्मान देना आरम्भ कर दिया। हिन्दू त्योहारों जैसे होली, दीवाली को प्रदुषण बताया और 14 फरवरी जैसे फूहड़ दिन को प्रेम का प्रतीक बताकर मानसिक प्रदुषण फैलाया। हर ईसाई स्कूल में 25 दिसंबर को सांता के लाल कपड़े पहन कर केक काटा जाने लगा। देखा देखी सभी हिन्दुओं द्वारा संचालित विद्यालय भी ऐसा ही करने लगे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि वे लोग किसका अँधा अनुसरण कर रहे है। इसे ही तो सांस्कृतिक अतिक्रमण कहते है।

*तृतीय चरण* में हमारे देश के केरल, उत्तर पूर्वी राज्य नागालैंड, गोवा आदि आते है। जहाँ की सरकार तक ईसाई चर्च की कृपा के बिना नहीं चल सकती। हिन्दुओं की इन राज्यों में कैसी दुर्गति है। समीप जाकर देखने से ही आपको मालूम चलेगा। अगर तीसरा प्रभुत्व का चरण भारत के अन्य राज्यों में भी आरम्भ हो गया तो भविष्य में क्या होगा?  यह प्रश्न पाठकों के लिए है। हिन्दू समाज को अपनी रक्षा एवं बिछुड़ चुके अपने भाइयों को वापिस लाने के लिए दूरगामी वृहद् नीति बनाने की अत्यंत आवश्यकता है। अन्यथा बहुत देर न हो जाये!

( _यह लेख मैंने अपने जीवन के पिछले 15 वर्षों के अनुभव के आधार पर लिखा है। दक्षिण, मध्य और उत्तर भारत में रहते हुए मैंने पर्याप्त समय ईसाई समाज के विभिन्न सदस्यों के साथ संवाद किया। यह लेख उसी अनुभव के आधार पर आधारित है।_ - *डॉ विवेक आर्य*)
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