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मित्रो ईसाईयों से जब भी बात करो ऐसे ही तार्किक चर्चा करो! और जब इनसे जवाब न मिले तो पीट दो! क्योकि इनकी औकात ही यही है!

शनिवार, 16 सितंबर 2017

मित्रो ईसाईयों से जब भी बात करो ऐसे ही तार्किक चर्चा करो!
और जब इनसे जवाब न मिले तो पीट दो!
क्योकि इनकी औकात ही यही है!
सवाल:— ईश्वर (God) कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस मैरी का बेटा है ?
ईसाई:— हां।
सवाल:— तो फिर मैरी को किसने बनाया ?
ईसाई:— ईश्वर ने बनाया।
सवाल:— OK, तो फिर ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस का जन्म हुआ था ?
ईसाई:— हां, हुआ था।
सवाल:— तो जीसस के पिता कोन हैं ?
ईसाई:— जीसस के पिता ईश्वर है।
सवाल:— तो फिर ईश्वर कौन है?
ईसाई:— जीसस है!
सवाल:— क्या जीसस ईश्वर का सेवक है?
ईसाई:— हाँ है।
सवाल:— क्या जीसस सूली पर मरे थे?
ईसाई:— हाँ मरे थे।
सवाल:— जीसस को पुनर्जीवित किसने किया ?
ईसाई:— ईश्वर ने किया।
सवाल:— क्या जीसस दूत (संदेशवाहक) थे?
ईसाई:— हाँ थे।
सवाल:— तो उनको पृथ्वी पर किसने भेजा था ?
ईसाई:— ईश्वर ने भेजा।
सवाल:— तो ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस ने धरती पर किसी की पूजा की थी?
ईसाई:— हाँ।
सवाल:— किसकी पूजा की थी ?
ईसाई:— ईश्वर की।
सवाल:— तो ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या ईश्वर का कोई प्रारम्भ है?
ईसाई:— नही है।
सवाल:— तो 25 दिसम्बर को कौन जन्मा था?
ईसाई:— जीसस जन्मे थे।
सवाल:— क्या जीसस ही ईश्वर है?
ईसाई:— हाँ जीसस ही ईश्वर है।
सवाल:—तो ईश्वर कहाँ है ?
ईसाई:— स्वर्ग में है।
सवाल:— स्वर्ग में कितने ईश्वर हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक ही ईश्वर है।
सवाल:—जीसस कहाँ है ?
ईसाई:— वो अपने पिता (ईश्वर ) के दायीं तरफ विराजमान है!
सवाल:— तो स्वर्ग में कितने ईश्वर हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक ही ईश्वर है।
सवाल:— वहां पर कितनी कुर्सियां हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक कुर्सी है।
सवाल:— जीसस कहाँ है?
ईसाई:— वे ईश्वर के पास बैठे हैं।
सवाल:— तो वे दोनों एक कुर्सी पर कैसे बैठ सकते हैं?
ईसाई:— ईश्वर पर इतने सवाल ?
आपको शैतान ने गुमराह कर रखा है ईश्वर के बारे में इतना गलत सिर्फ शैतान ही सोच सकता है!
आप शैतान के जाल में फंसे हुए हैं!
क्या मजाक है BC!
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गहराई से सोचिए ..... ????!!!!

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

*गहराई से सोचिए*जिसने भी मुझे यह संदेश भेजा है,उसको धन्यवाद।कृपया आप भी आगे भेजें।
सैनिको पर पत्थर –           अहिंसक आंदोलन 
लव जिहाद पर कार्यवाही-  गुंडागर्दी
पत्थरबाज-                       भटके हुए नौजवान
भारत तेरे टुकडे –              अभिव्यक्ति आजादी
भंसाली को थप्पड़ –           हिन्दू आतंकवाद 
गौमांस भक्षण    –              भोजन का अधिकार 
ईद पर बकरा काटना –      धार्मिक स्वतंत्रता 
तीन तलाक हलाला   –      धार्मिक अंदरूनी मामला 
दीवाली पटाखे         –        पर्यावरण प्रदूषण 
न्यू इयर पटाखे         –       जश्न का माहौल
मटकी फोड में बच्चे –        असंवैधानिक
खतना मे बच्चे    –       धार्मिक अंदरूनी मामला 
प्लेटफार्म पर नमाज –        धार्मिक अधिकार 
सड़क पर पंडाल –             सड़क जाम का केस
मस्जिद लाउडस्पीकर   –   धार्मिक स्वतंत्रता 
मंदिर मे लाउडस्पीकर –     ध्वनि प्रदूषण 
करवाचौथ         –               ढकोसला 
वैलेंटाइनडे         –              प्यार का पर्व 
चार शादियां        –             धार्मिक स्वतंत्रता
हिन्दू दो शादी       –            केस दर्ज 
गणेश विसर्जन, होली  –     जल प्रदूषण 
ताजिया विसर्जन   –            संविधान अधिकार 
आजम,ओवैसी,केजरी-      राष्ट्र पुरुष
मोदी,योगी,स्वामी-             हिन्दू आतंकवादी
भगत सिंह सुखदेव राजगुरु- आतंकवादी
अफजल,कसाब,बुरहान-     शहीद
15 मिनिट पुलिस हटालो-     सहिष्णुता
भाजपा चुनाव जीती-             असहिष्णुता
कश्मीर,असम केरल दंगे-      देश शांत
अख़लाक़,गुजरात दंगे-      अवार्ड वापसी,असहिष्णु देश
शिव लिंग पर दूध चढ़ाना-      दूध की बर्बादी
बकरे काटना,चादर चढ़ाना-  धार्मिक मान्यता
भारत की सच्चाई

वाह मीडिया वाह

वाह कांग्रेसियों​ वाह

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Beware of christian school terrorism....

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

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दोस्तो चित्र को कम देखना बल्कि जो लिखा है उसको ध्यान से पढ़ना और विचार करना ओर जवाब देना....

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

कुँ दिलीप सिहं शेखावत
एक आवाज भारतीय । दोस्तो चित्र को कम देखना बल्कि जो लिखा है उसको ध्यान से पढ़ना और विचार करना ओर जवाब देना
लड़कियो के अनावश्यक नग्नता वाली पोशाक में घूमने पर जो लोग या स्त्रीया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो....
उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???
1)हम सोच क्यों बदले?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपने लोगो की सोच का ठेका लिया है क्या??
2) आप उन लड़कियो की सोच का आकलन क्यों नहीं करते?? उसने क्या सोचकर ऐसे कपडे पहने की उसके स्तन पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे,वही एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उस देखे
3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये.....
हत्या ,डकैती, चोरी, बलात्कार, आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों????
4) कुछ लड़किया कहती है कि हम क्या पहनेगे ये हम तय करेंगे....पुरुष नहीं.....
जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करे....लेकिन हम पुरुष भी किस लड़की का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रीया नहीं.... और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे
5)फिर कुछ विवेकहीन लड़किया कहती है कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की.....
जी बिल्कुल आज़ादी है,ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो,गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो,वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो,पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो।
6)लड़को को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा की क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे??? क्या ये लड़किया पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से देखती है ??? जब ये खुद पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की "हमें माँ/बहन की नज़र से देखो"
कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती है??? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था....
सत्य ये है कीअश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।।और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करता है।
मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता(सेक्स) भी है।
चाणक्य ने चाणक्य सूत्र में सेक्स को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है।।
अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रीया अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती????
गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।।
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हिंदुओं की दयनीय स्थिति....

गुरुवार, 24 अगस्त 2017

पढो और सोचो.....
# हिरण पूरे दिन घास खाने मे लगा रहता है… घास को प्रोटीन मे बदलने मे ही लगा रहता है....
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दूसरी तरफ माँसाहारी जानवरों को जब तक भूख नही लगती.. बस आराम से पड़े रहते हैं, क्यों कि उन्हें पता है कि उनके लिए प्रोटीन का इंतजाम करने के लिए हिरण जो लगा हुआ है…
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जब तक हिरण जिंदा है, जंगल में खूंखार जानवर मस्त सोते है… पर हिरण जब कम होने लगते हैं तो ये भूखे खूंखार नए जंगल की तलाश करते हैं.....
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हिन्दू हिरणों ने बड़ी मेहनत से सोना, चांदी, हीरे, ज्ञान-विज्ञान इकट्ठा किया था… क्या हुआ ??
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एक खूंखार नस्ल साफ कर गई सब..…!!-- ईरान लिया, अफगानिस्तान लिया, पाकिस्तान लील गए, कश्मीर लिया, बांग्लादेश लिया, केरल, बंगाल और आसाम भी गया ही समझो.....???
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उस नस्ल ने सिर्फ शिकारी predator के गुण विकसित किये है…...
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अब पाकिस्तान और बांग्लादेश में खाने पीने की भयंकर कमी आ रही है… क्यों कि हिन्दू पंजाबी सिंधी, अहमदिया जैसे हिरण कम हो चुके है… जिनकी वजह से इकॉनोमी चल रही थी…??
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बाकी का काम सिर्फ शरीयत को 100 प्रतिशत लागू करना है, जिसकी वजह से धीरे धीरे पाकिस्तान बांग्लादेश में हिरण खत्म हो रहे है,,, और खूंखार नरभक्षी बढ़ रहे है…. अब उन नरभक्षियों की नजर नए जंगलों पे है… वो है भारत...??
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इसे ही वो गज़वा ए हिन्द कहते है,, और उनके मजहबी किताबों में इसका जिक्र हो चुका है, हर शांतिप्रिय शेर के मन मे वो ऐसे बैठा हुआ है जैसे तुम्हारे लिए राष्ट्रगान !!!!
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इस आखरी जंग मे सेना कुछ नही कर पाएगी क्यों कि ये जंग अंदर से शुरू होगी… फिर बाहर से....
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….जितनी तेजी से पाक~बांग्लादेश से हिरण कम हो रहे है उतनी ही जल्दी इसकी संभावना बढ़ रही है, और ये जंग अचानक नही होगी. तुम पहले से ही इस जंग में हो… विश्वास न हो तो आसाम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश केरल आदि के उनकी बाहुल्य वाले इलाके मे घूम के आओ… वहां से हिरणों ने घर और सम्पति बेच के कही और बसेरा बना लिया है…!
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हमारे यहाँ के हिरण कहाँ जाने की सोच रहे हैं ???????
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5 Truths Accidentally Revealed by an American Student on a ‘Mission Trip’ to Karnataka

शनिवार, 19 अगस्त 2017

5 Truths Accidentally Revealed by an American Student on a 'Mission Trip' to Karnataka


American students on short-term 'mission trips' to Bharat in pursuit of the 'Great Commission' (the Biblical mandate to make disciples of all nations) is a phenomenon that has grown rapidly over the last 2-3 decades. As per some estimates by Christian groups, short-term missions across the world attract over 2 million participants each year from America alone.

Where do these students go? Well, most of them come to countries which fall in the 10/40 window – a rectangular area of North Africa, the Middle East and Asia between 10 degrees north and 40 degrees north latitude. The 10/40 Window, devised by the hardline Christian 'Joshua Project', is often called "The Resistant Belt" and includes the majority of the world's Hindus and Buddhists and Muslims – over 4 billion "unreached" people.

As evangelism is banned in almost all Islamic nations and preaching the Gospel to Muslims can be a life-threatening proposition, missionaries prefer to focus on converting Hindus, tribals and Buddhists. And these American missionary students come from everywhere – local Churches (mostly Evangelical Protestant groups like Baptists, Pentecostals etc), Christian colleges (there are many such colleges in the West which offer degrees in 'divinity studies'), seminaries and even high schools. They use local Church donations and other innovative means like crowd-funding, corporate donations etc to fund these trips which often have a social cover like teaching English, medical assistance, disaster relief etc.

Now, a routine article in a nondescript US paper 'Fort Madison Daily Democrat' published from the Mid-Western state of Iowa has revealed 5 interesting insights about how missionaries operate in and perceive Bharat. Articles projecting missionaries as brave souls helping to redeem lives in the 'dark, neglected corners of the world' are common in the local media of the US heartland, also called the 'Bible Belt'.

The article talks about the first mission trip to Bharat by a female graduate student Rebekah Carter studying at Faith Baptist Bible College. Carter was accompanied by another student Renee Boswell and her mother. The article says they went to 'Kannada' (Karnataka) where Boswell's father works as a pastor. The Boswell couple works with a Pennsylvania-based missionary group whom Carter does not name "lest this story be noticed online by the wrong people."

Rebekah Carter of Montrose leads Bharatiya children in singing at a Vacation "Bible School" event in Kannada (sic), Bharat. Carter, a student at Faith Bible Baptist in Ankeny, went on a "mission trip" in June (Courtesy: Daily Democrat)

What are the 5 truths that the articleaccidentally reveals?

1.) Abuse of Tourist Visas in Bharat by Missionaries

Carter reveals that the missionary couple (Boswells) have been in Bharat on a "tourist visa" – for the last 30 years!

"I thought it was pretty cool," Carter said, "that God protected them so they could get away with it."

tourist visa is granted for visiting Bharat for recreation, sight-seeing, casual visits to meet friends etc. No other activities are permissible on a tourist visa. US citizens can get up to 10-year tourist visa, which allows multiple entries with maximum stay duration of 6 months on each visit.

Interestingly, a visa category called 'MISSIONARY VISA' seems to have been introduced in late 2012 by  the UPA regime – going by this old Niti Central article now reproduced on DefenceForumIndia.com.

As per GOI's wesbite, the missionary visa category is defined as "Visa to foreign missionaries, other than those holding 'No objection to return to India Endorsements', are granted only after clearance by concerned Ministry/ Department in India."

Moreover, if one goes to the website of the Official Partner of Embassy of India in US, it says "A 'MISSIONARY VISA is issued to persons coming to India for religious purposes or to join a foreign Missionary organization in India approved by the Government of India, not involving proselytization."

Recently, two Christian MPs from Meghalaya have raised concern in Parliament about "persecution" of foreign Christian missionaries who they allege are facing difficulties in extending visas.

Going by the above mentioned information, there seems to be a grey-area on what activities are permitted under 'Missionary Visa' – if it is indeed the case that the "missionary visa" category was introduced by UPA in 2012 or certain relaxations were introduced, why hasn't this been rolled back as yet? Why are we giving official approval to the word "missionary" (exclusively associated worldwide with Christian proselytization/evangelism) by having a dedicated visa category – the US counterpart for this visa category is "religious worker." This is an area which the MEA and Home Ministry need to clarify.

But what is clear is that Missionary Visa holders are required to register with the Government within 14 days of arrival – allowing the Government to track them and take quick action if social tensions rise due to missionary activity. Which explains why missionaries actually prefer to operate under the more relaxed tourist visa category.

This blatant abuse of Bharatiya law is condoned as "God's wish" by foreign missionaries. Also, the whole secular cabal in Bharat does not utter a word on this, rather they join hands with the West-backed missionaries in condemning the GOI for "Christian persecution" i.e. trying to enforce Bharatiya law as a sovereign state.

An online petition was started by @Noconversion last year to stop this widespread abuse of tourist visas. The petitioners have also provided a screenshot which apparently shows how an American missionary group IGL (India Gospel League) is advising foreign missionaries to commit fraud while applying for visas (the weblink in below screenshot is no longer active) –

2.)  Hindus are easy targets for missionaries, but they avoid Muslim areas

"Northern India has a strong Muslim population, she said, where it's more dangerous to share your faith"

This statement by Carter is a no-brainer for anyone who understands the inherent aggression of Islam where conversion out of Islam is considered as the mortal sin of apostasy, punishable by death. As Christian missionary work by its very nature involves belittling the belief system of the other, in Islam this becomes blasphemy and any blasphemer is quickly served mob justice. Hindus on the other hand are more tolerant of theological debates and religious doctrines being questioned, which gives space for the missionaries to slowly weave their web. And if any Hindu gets too worked up when a missionary starts openly abusing Hindu deities, one can always shout 'persecution' and call in support from the strong Christian-secular lobby in Bharat.

So while the global Christian missionary lobby protests loudly against their very real persecution in Muslim countries, in Bharat the same Islamists are allies of the missionaries against their common enemy (and target for proselytization), the Hindu.

3.) False equivalence between Christian 'right' to proselytize in Bharat and similar right for Hindus in USA

""but one time they got arrested" she said of the local missionaries. She said he used as his defense that it should be no different than if a Hindu came to America and wanted to share his faith."

It is totally misleading to claim that any Hindu group in USA behaves the way that Christian missionaries do in Bharat. Hindu Dharma is not a proselytizing religion – even sects like ISKCON that spread the message of the Gita do not trash Christianity or call for conquering 'America for Krishna' in the manner that the Pope called for an evangelical crusade in Bharat.

The Hindus that believe in sharing their faith do so ethically, without imposing their views or promising miraculous salvation – the myriad forms of worship and concept of ishta devata (chosen deity) in Hindu Dharma show how intrinsic plurality is for Hindus. For Hindus, and indeed for all Dharmics like Sikhs, Jains, Buddhists, Dharma is not a competitive enterprise with the end goal of winning more converts for your God. We just don't think like that.

As Rajiv Malhotra says, today we have an asymmetric dialog of civilizations – where everything is evaluated in a Western framework. So to say that Christians have a right to proselytize in Bharat because Hindus have a similar right to proselytize in USA is akin to saying Christians should have a right to bear arms in Bharat because Hindu Americans have the right to bear arms in USA. Bharat is a sovereign state, and has every right to frame laws as per its unique socio-economic conditions.

The delicate tapestry of various Dharmic schools of thoughts, sects and tribal belief systems like Santhal, Donyi-Polo, Sarna that exist in Bharat must be preserved at all costs – we have seen how mindless colonization and so-called Western progress decimated native belief systems (and native tribes) of North and South America; Bharat must avert a similar faith and preserve its Dharmic heritage.

4.) Evangelism in guise of Humanitarian service 

"Because Renee was a nurse, "the majority of the team did medical camps" at various villages, Carter said…."It's interesting: We have so many doctors from India that come to America, but there's not many doctors there."…."While (the others) were giving medical treatment, we were giving spiritual treatment," Carter said."

This again shows how social work in the developing world is used as a beach-head for the real goal – harvesting souls. So should poor countries like Bharat welcome missionaries just because they run schools, orphanages and hospitals?

Would we allow an MNC to exploit the country's resources while breaking laws, giving the logic that it was generating some employment? The British built many Western-education providing schools & colleges, hospitals and even a railway network – but in exchange they killed millions of Bharatiyas (either directly or through induced famines), looted our wealth (our share of global GDP plummeted from ~ 25% to 2% during British raj) and mentally colonized us to fill us with immense self-loathing for generations to come.

And haven't we seen how this harmless looking humanitarian aid slowly morphs into strident rights-based agitations which encourage intra-community disputes and asks Christians to uphold the Gospel over the law & interests of their nation?

By the way, many rootless HINOs (Hindu In Name Only) who say 'Hindus need to get their act together instead of whining about missionaries serving the poor and needy', do not know of the countless Hindu organizations – religious and otherwise – working selflessly with scarce resources. Why not join those Hindu organizations or just do some sewa at your local temple, rather than look to rationalize your own apathy & indolence?

Hindus have a timeless tradition of community service and tyaag (renunciation) – many of us living in urban centers have lost sight of how our ancestors used to routinely donate till 50-60 years back (just look at all the colleges, Dharamshalas, hospitals started by Hindu merchants)….civilizational awareness and freedom from the stifling Government bureaucracy is all it will take to revive the creative Hindu spirit of creating and sharing wealth.

5.) Christianity brings prosperity, happiness

"Despite the many who frown on Christian evangelism there, Carter said, "They're very accepting. Even the really strict Hindus would invite us into their lives…"Hindus have tons of gods, and they would ask, 'What does yours have that others don't?'"… Carter was struck by the happiness of the people who usually had very little in the way of material possessions. "They don't have much, but they will go the extra mile to give you what they don't have," she said. At one man's home, it didn't have electricity, and yet "he went out and got us pop…."That's what I miss the most, is the people," Carter said."

If missionary schools taught one to introspect and really appreciate other cultures, Carter would have realized the irony of the situation – here she is, trying to tell Hindus that they are hell-bound sinners for not accepting Jesus Christ as their savior, and on the other hand she herself acknowledges that Hindus are content, happy people, with even the most orthodox Hindus being open to discuss their beliefs and hear opposing viewpoints. So what are the missionaries trying to achieve by converting such people? Why are they spreading false stories about angry, fanatical Hindus out to persecute Christians?

Another idea that missionaries have promoted across the world is the idea of 'prosperity gospel' –  the religious belief that Christians are blessed with financial and physical well-being. The association of English language, considered the global language of commerce, with Christianity lends further weight to this theory. Admission to convent schools, reserved seats in Christian colleges, cheap treatment in Christian hospitals – these are some of the carrots held out for the poor in Bharat. It is another matter that Christian hegemony in education is a result of the skewed secular state of Bharat which actively discriminates against Hindus in this crucial sector.

But one look around the world, and within Bharat, busts this myth for good – have countries in Africa and South America that embraced Christianity enmasse after abandoning their ancestral faiths, broken free of the poverty trap? Within Bharat, are states that are almost entirely Christian considered stable, prosperous, innovative role models for the rest of the country? On the contrary, countries like Japan, Israel, China grew strong by retaining their core civilizational identity while learning from the progress made by the West in science & technology. This is the path that Bharat has to follow.

"Let noble thoughts come to me from all directions" says the Rig Veda. But we must do this without losing the critical faculty to judge which thought is noble, and which is not.

We bear no grudge against the likes of Rebekah Carter – these are just impressionable young people indoctrinated with a supremacist ideology masquerading as all-encompassing love. Our fight is with those who are running this global missionary machinery, and their political & academic backers, both within and outside Bharat.

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ईसाईयों बहुत बुरी मौत मारे जाओगे, याद रखना।

रविवार, 23 जुलाई 2017

तुम भारत में ईसाईयत फैलाओगे न???? हम पूरा GLOBE कवर कर लेंगे कुछ ही समय में, देखते रहना।
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भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही।

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही।

भारत में सती प्रथा
भारत में कभी सति प्रथा थी ही नही, रामायण / महाभारत जैसे ग्रन्थ कौशल्या, कैकेई, सुमित्रा, मंदोदरी, तारा, सत्यवती, अम्बिका, अम्बालिका, कुंती, उत्तरा, आदि जैसी बिध्वाओं की गाथाओं से भरे हुए हैं। किसी भी प्राचीन ग्रन्थ में सति-प्रथा का कोई उल्लेख नहीं है. यह प्रथा भारत में इस्लामी आतंक के बाद शुरू हुई थी। ये बात अलग है कि- बाद में कुछ लालचियों ने अपने भाइयों कि सम्पत्ति को हथियाने के लिए अपनी भाभियों की ह्त्या इसको प्रथा बनाकर की थी।
इस्लामी अत्याचारियों द्वारा पुरुषों को मारने के बाद उनकी स्त्रीयों से दुराचार किया जाता था, इसीलिये स्वाभिमानी हिन्दू स्त्रीयों ने अपने पति के हत्यारों के हाथो इज्जत गंवाने के बजाय अपनी जान देना बेहतर समझा था। भारत में जो लोग इस्लाम का झंडा बुलंद किये घूमते हैं, वो ज्यादातर उन वेवश महिलाओं के ही वंशज हैं जिनके पति की ह्त्या कर महिला को जबरन हरम में डाल दिया गया था। इनको तो खुद अपने पूर्वजों पर हुए अत्याचार का प्रतिकार करना चाहिए।
सेकुलर बुद्धिजीवी "सतीप्रथा" को हिन्दू समाज की कुरीति बताते हैं जबकि यह प्राचीन प्रथा है ही नहीं. रामायण में केवल मेघनाथ की पत्नी सुलोचना का और महाभारत में पांडू की दुसरी पत्नी माद्री के आत्मदाह का प्रसंग है। इन दोनो को भी किसी ने किसी प्रथा के तहत बाध्य नहीं किया था बल्कि पति के वियोंग में आत्मदाह किया था।
चित्तौड़गढ़ के राजा राणा रतन सेन की रानी "महारानी पद्मावती" का जौहर विश्व में भारतीय नारी के स्वाभिमान की सबसे प्रसिद्ध घटना है। ऐय्याश और जालिम राजा "अलाउद्दीन खिलजी" ने रानी पद्मावती को पाने के लिए, चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी थी , राजपूतों ने उसका बहादुरी से सामना किया। हार हो जाने पर रानी पद्मावती एवं सभी स्त्रीयों ने , अत्याचारियों के हाथो इज्ज़त गंवाने के बजाय सामूहिक आत्मदाह कर लिया था. जौहर /सती को सर्वाधिक सम्मान इसी घटना के कारण दिया जाता है।
चित्तौड़गढ़, जो जौहर (सति) के लिए सर्वाधिक विख्यात है उसकी महारानी कर्णावती ने भी अपने पति राणा सांगा की म्रत्यु के समय (1528) में जौहर नहीं किया था, बल्कि राज्य को सम्हाला था। महारानी कर्णावती ने सात साल बाद 1535 में बहादुर शाह के हाथो चित्तौड़ की हार होने पर, उससे अपनी इज्ज़त बचाने की खातिर आत्मदाह किया था। औरंगजेब से जाटों की लड़ाई के समय तो जाट स्त्रियों ने युद्ध में जाने से पहले, अपने खुद अपने पति से कहा था कि उनकी गर्दन काटकर जाएँ।
गोंडवाना की रानी दुर्गावती ने भी अपने पति की म्रत्यु के बाद 15 बर्षों तक शासन किया था। दुर्गावती को अपने हरम में डालने की खातिर जालिम मुग़ल शासक "अकबर" ने गोंडवाना पर चढ़ाई कर दी थी। रानी दुर्गावती ने उसका बहादुरी से सामना किया और एक बार मुग़ल सेना को भागने पर मजबूर कर दिया था। दुसरी लड़ाई में जब दुर्गावती की हार हुई तो उसने भी अकबर के हाथ पकडे जाने के बजाय खुद अपने सीने में खंजर मारकर आत्महत्या कर ली थी।
"सती" का मतलब होता है, अपने पति को पूर्ण समर्पित पतिव्रता स्त्री। सती अनुसूइया, सती सीता, सती सावित्री, इत्यादि दुनिया की सबसे "सुविख्यात सती" हैं और इनमें से किसी ने भी आत्मदाह नही किया था। जिनके घर की औरते रोज ही इधर-उधर मुह मारती फिरती हों, उन्हें कभी समझ नहीं आ सकता कि - अपने पति के हत्यारों से अपनी इज्ज़त बचाने के लिए, कोई स्वाभिमानी महिला आत्मदाह क्यों कर लेती थी।
हमें गर्व है भारत की उन महान सती स्त्रियों पर, जो हर तरह से असहाय हो जाने के बाद, अपने पति के हत्यारों से, अपनी इज्ज़त बचाने की खातिर अपनी जान दे दिया करती थीं। जो स्त्रियाँ अपनी जान देने का साहस नहीं कर सकी उनको मुघलों के हरम में रहना पडा। मुग़ल राजाओं से बिधिवत निकाह करने वाली औरतों के बच्चो को शहजादा और हरम की स्त्रियों से पैदा हुए बच्चो को हरामी कहा जाता था और उन सभी को इस्लाम को ही मानना पड़ता था।
जिस "सती" के नाम पर स्त्री के आत्मबलिदान को "सती" होना कहा जाता है उन्होंने भी पति की म्रत्यु पर नहीं बल्कि अपने मायके में अपने पति के अपमान पर आत्मदाह किया था। शिव पत्नी "सती" द्वारा अपने पति का अपमान बर्दास्त नहीं करना और इसके लिए अपने पिता के यग्य को विध्वंस करने के लिए आत्मदाह करना , पति के प्रति "सती" के समर्पण की पराकाष्ठ माना गया था। इसीलिये पतिव्रता स्त्री को सती कहा जाता है, जीवित स्त्रियाँ भी सती कहलाई जाती रही है।
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ईसाई समुदाय हिंदुओं के विनाश की शपथ लेता है....

शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

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जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं.....

रविवार, 2 जुलाई 2017

जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं.....



जानें सम्मोहन विद्या क्या है, आजकल कैसे इसाई मिशनरी इसका प्रयोग करके घर्म परिवर्तित कर रहे हैं
सम्मोहन को अंग्रेजी में हिप्नोटिज्म कहते हैं। इस प्राचीन विद्या का एक ओर जहां दुरुपयोग हुआ और हो रहा है, वहीं इस विद्या के माध्यम से लोगों का भला ‍भी किया जा रहा है।
भला करने वालों का अपना स्वार्थ भी उसमें शामिल है। सम्मोहन के बारे में हर कोई जानना चाहता है, लेकिन सही जानकारी के अभाव में वह इसे समझ नहीं पाता है।
सवाल यह उठता है कि क्या सम्मोहन विद्या से किसी भी प्रकार का रोग दूर हो सकता है? क्या सम्मोहन से किसी भी प्रकार की शक्ति और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है
और क्या इसके माध्यम से दूसरों को अपने इशारे पर नचाया जा सकता है? सवाल और भी हो सकते हैं लेकिन आखिर सम्मोहन विद्या का सत्य क्या है और क्या है इसका रहस्य?
सम्मोहन विद्या भारतवर्ष की प्राचीनतम और सर्वश्रेष्ठ विद्या है। सम्मोहन विद्या को ही प्राचीन समय से 'प्राण विद्या' या 'त्रिकालविद्या' के नाम से पुकारा जाता रहा है।
कुछ लोग इसे मोहिनी और वशीकरणविद्या भी कहते हैं। अंग्रेजी में इसे हिप्नोटिज्म कहते हैं। हिप्नोटिज्म मेस्मेरिज्म का ही सुधरा रूप है।
यूनानी भाषा हिप्नॉज से बना है हिप्नोटिज्म जिसका अर्थ होता है निद्रा। 'सम्मोहन' शब्द 'हिप्नोटिज्म' से कहीं ज्यादा व्यापक और सूक्ष्म है।
पहले इस विद्या का इस्तेमाल भारतीय साधु-संत सिद्धियां और मोक्ष प्राप्त करने के लिए करते थे। जब यह विद्या गलत लोगों के हाथ लगी तो उन्होंने इसके माध्यम से काला जादू और लोगों को वश में करने का रास्ता अपनाया।
मध्यकाल में इस विद्या का भयानक रूप देखने को मिला। फिर यह विद्या खो-सी गई थी।
आधुनिक युग में भारत की सम्मोहन विद्या पर पश्चिमी जगत ने 18वीं शताब्दी में ध्यान दिया। भारत की इस रहस्यमय विद्या को अर्ध-विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का श्रेय सर्वप्रथम ऑस्ट्रियावासी फ्रांस मेस्मर को जाता है।
बाद में 19वीं शताब्दी में डॉ. जेम्स ब्रेड ने मेस्मेर के प्रयोगों में सुधार किया और इसे एक नया नाम दिया 'हिप्नोटिज्म'।
इस विद्या का उपयोग ईसाई मिशनरियों ने ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए किया और वे आज भी कर रहे हैं। वे लोगों को बार-बार सुझाव-निर्देश देकर यह विश्वास कराने में कामयाब रहते हैं कि ईसाई धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
वे इसके माध्यम से गरीब मुल्कों के गरीबों में उनका इलाज कर इसे यीशु के चमत्कार से जोड़कर करते हैं। वे चंगाई सभा करके इस विद्या के माध्यम से लोगों को सम्मोहित करते हैं।
मेस्मेरिज्म क्या है : पाश्चात्य डॉक्टर फ्रेडरिक एंटन मेस्मर ने 'एनिमल मेग्नेटिज्म' का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए अनेक व्यक्तियों को रोगों से मुक्त किया था। उनके प्रयोगों को मेस्मेरिज्म कहा जाता है।
मेस्मेरिज्म के प्रयोगों पर जांच बैठाई गई और बाद में इसे खतरनाक मानते हुए इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। 1841 में मेस्मेरिज्म के प्रयोगों में सुधार करने और उसमें निहित वैज्ञानिक तथ्यों को उद्घाटित करने और उसे हिप्नोटिज्म के रूप में परिवर्तत करने का श्रेय डॉक्टर जेम्स ब्रेड को जाता है।
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लालू के घर के दरवाजे पे घंटी बजती है....

शुक्रवार, 30 जून 2017

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कान्वेन्ट का अर्थ है नाजायज बच्चों के लिए ।

गुरुवार, 29 जून 2017

कान्वेन्ट का अर्थ 

कान्वेन्ट का अर्थ- 

सबसे पहले यह जानना आवश्यक है कि ये शब्द कहाँ से आया है तो आइये प्रकाश डालते हैं ।

ब्रिटेन में एक कानून था लिव इन रिलेशनशिप बिना किसी  वैवाहिक संबंध के एक लड़का और एक लड़की का साथ में रहना।

जब साथ में रहते थे तो शारीरिक संबंध भी बन जाते थे तो इस प्रक्रिया के अनुसार संतान भी पैदा हो जाती थी तो उन संतानों को किसी चर्च में छोड़ दिया जाता था।

अब ब्रिटेन की सरकार के सामने यह गम्भीर समस्या हुई कि इन बच्चों का क्या किया जाये तब वहाँ की सरकार ने कान्वेन्ट खोले अर्थात जो बच्चे अनाथ होने के साथ साथ नाजायज हैं उनके लिए कान्वेन्ट बने।

उन अनाथ और नाजायज  बच्चों को रिश्तों का एहसास कराने के लिए  उन्होंने अनाथालयो में एक फादर एक मदर एक सिस्टर होती है क्योंकि ना तो उन बच्चों का कोई जायजा बाप है न माँ है  न बहन है।।

तो कान्वेन्ट बना नाजायज बच्चों के लिए ।

अब अपनी मूर्खता देखिए जिनके जायजा माँ बाप भाई बहन सब हैं वो कान्वेन्ट में जाते है तो क्या हुआ एक बाप घर पर है और दूसरा कान्वेन्ट में जिसे फादर कहते हैं । 

आज जिसे देखो कान्वेन्ट खोल रहा है जैसे बजरंग बली कान्वेन्ट स्कूल,  माँ भगवती कान्वेन्ट स्कूल ।

अब कौन समझाये कि भइया माँ भगवती या बजरंग बली का कान्वेन्ट से क्या लेना देना।

मै सभी महानुभावो से निवेदन करता हूँ कि अपने बच्चों को इसाई बनने से बचाये…………

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लड़कियो के नग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रीया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो....उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???

बुधवार, 14 जून 2017
लड़कियो केे नग्न घूमने पर जो लोग या स्त्रीया ये कहते है की कपडे नहीं सोच बदलो....उन लोगो से मेरे कुछ प्रश्न है???1)हम सोच क्यों बदले?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपने लोगो की सोच का ठेका लिया है क्या??2) आप उन लड़कियो की सोच का आकलन क्यों नहीं करते?? उसने क्या सोचकर ऐसे कपडे पहने की उसके स्तन पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ो के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे,वही एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उस देखे3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये.....हत्या,डकैती,चोरी,बल
ात्कार,आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों????4) कुछ लड़किया कहती है कि हम क्या पहनेगे ये हम तय करेंगे....पुरुषनहीं.....जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करे....लेकिन हम पुरुष भी किस लड़की का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रीया नहीं.... और हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे5)फिर कुछ विवेकहीन लड़किया कहती है कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की.....जी बिल्कुल आज़ादी है,ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो,गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो,वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो,पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो।6) फिर कुछ नास्तिक स्त्रीया कुतर्क देती है की जब नग्न काली की पूजा भारत में होती है तो फिर हम औरतो से क्या समस्या है??पहली बात ये की काली से तुलना ही गलत है।।और उस माँ काली कासाक्षात्कार जिसने भी किया उसने उसे लाल साडी में ही देखा....माँ काली तो शराब भी पीती है....तो क्या तुम बेवड़ी लड़कियो की हम पूजा करे?? काली तो दुखो का नाश करती है....तुमलड़किया तो समाज में समस्या जन्म देती हो...... और काली से ही तुलना क्यों??? सीता पारवती से क्यों नहीं?? क्यों न हम पुरुष भी काल भैरव से तुलना करे जो रोज कई लीटर शराब पी जाते है???? शनिदेव से तुलना करे जिन्होंने अपनी सौतेली माँ की टांग तोड़ दी थी।7)लड़को को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा की क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे??? क्या ये लड़किया पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से देखती है ??? जब ये खुद पुरुषो को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती है की "हमें माँ/
बहन की नज़र से देखो"कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती है??? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था....सत्य ये है कीअश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधो की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दूकान है।।और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करता है।मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशो में एक नशा अश्लीलता(सेक्स)भी है।चाणक्य ने चाणक्य सूत्र में सेक्स को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है।।अगर ये नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रीया अत्याधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती????गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधो को जन्म देती है।।
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