ईसाइयत एक मूर्खता या अंधविश्वास ???

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018
इसाई लोग कहते है .. सारी दुनिया  आदम और ईव के बच्चो से शुरू हुई ... उनके सिर्फ तीन लड़के थे ... तो इन लडको ने दुनिया  कैसे  बनाई  बिना  लड़की के ?....अगर इनकी कोई बहन भी होती .. तो भी  यह बात  बहुत  ही गलत है .... जरा सोचो
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How are Missionaries Dangerous to Bharat?

सोमवार, 15 जनवरी 2018

How are Missionaries Dangerous to Bharat?

(This question originally appeared on Quora and we are reproducing the answer by Jeyo Sargunam)

Dear Seeker,

My name is Jeyo Sargunam…. and i was a Missionary…..wannabe.

Back Story – My ex-life as a Quasi Missionary

I come from a hard line Christian family and our family have done a decent job of producing Christian priests & missionaries over the last few generations. We have had 3 Bishops & a dozen christian preachers in our lineage. Since my teen i started drifting more & more toward hard-line Christianity and for obvious reasons my local environment was very conductive for my drift. I used to organize rallies, conduct church revival meetings, organize the youth & have outreach mission where you will expose the concept of Christ to poor people.

So basically i was not the affected party, however was the perpetrator as a quasi missionary.

Life had some other plans:

I had convinced my self that i will attend bible school and start my life as a missionary. However Life is funny in its own way. Thanks to an altercation at my church I ended up shipwrecking my faith in Jesus Christ. I prayed my last prayer on 25th April 2005 at 5:30 AM and renounced Christianity.

DNA of a Missionary organization

  • Believer greater than 'Non Believer': People who don't have faith in Jesus are looked down upon. As if you have some disease that needs to be fixed. Some times it is very outright, however most of the time it is very subtle. This is the reason people act "holier than thou"
  • Missionaries are well a oiled marketing machine: Believe me, every missionary on field is properly trained on how to approach, present & influence a non believer (mostly Hindus) toward Christianity. They go through extensive training and coaching.
  • They have targets: Just like any corporate organization, they also have targets. Just like how a sales call center focus on conversion, these poor missionaries have targets for conversion…. oops .. to put in a polished way .. to get them redeemed by Lord & Savior Jesus Christ.

They are well funded: You cannot beat the Christian setup. It is well rooted and well funded. Most of these organizations are decades old and have good assets and money. They can outspend any other Ghar Wapsi gimmick that RSS can try.

Yes, Missionaries are dangerous

  • It is like a virus: They target people who are either poor or emotionally vulnerable. This is wrong at every level as people who need comfort & love…. get manipulated toward Christianity. Sometimes this process takes years to complete; however like a virus, once affected it will slowly start taking control.
  • They manipulate: It is no surprise that in Tamil, the holy bible is called Vedam, Christian priest is called Iyer. Church is called Kovil. Such dilutions were done so that they can attract and make Christianity more acceptable.
  • They pollute & destroy local cultures to their advantage. Local cultures are slowly displaced and replaced. For Example: Gurukul method of teaching.
  • They preach hatred in a very subtle way. They always teach about "us" and "them. They teach to ' tolerate' however never to 'accept'.
  • Screw every one in the name of secularism: Till the time they are converting, it is ok…the day they have resistance, they will play the secularism and minority card. For example, thousands of Hindu temples have been desecrated, however if one church got desecrated….it will become a symbol of oppression by the majority.


The slow destruction of Bharat's culture, values and current life can all be traced back to the moral decadence bought by Missionaries. You will see this patterns repeat in Africa, Americas, Australia in the last 500 years where missionaries tried to replace a pluralist society with a religion that is one size fit all.

Looking back i am not proud of what i did…. however thank god (whoever it may be) that i am not a Missionary however ……only like the missionary position.

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क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर(भोसडीवाले) !

रविवार, 24 दिसंबर 2017

क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर !

  क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर ! जी हां हम सभी बात कह रहे है, देश के सेक्युलर और वामपंथी हिन्दुओ से इतनी नफरत करते है, जिसका कोई भी हिसाब नहीं है, ये हर हिन्दू त्यौहार, हर हिन्दू रीति रिवाज का विरोध करते है, उसकी बुराई करते है, ऐसा ये इसलिए करते है ताकि हिन्दुओ के मन में हीन भावना आ जाये, और वो अपने ही धर्म से नफरत करे

ऐसा करने से ये वामपंथी मिशनरियों और जिहादियों के साथ मिलकर भटके हिन्दू को आसानी से धर्मांतरित कर सकते है, और इसी कारण हिन्दू रीति रिवाजों और त्योहारों के खिलाफ ये आये दिन जहर उगलते है, हिन्दू तुलसी की पूजा करते है, तुलसी का सम्मान करते है, तो ये सेक्युलर उसे अन्धविश्वास बताते है 

आपको बता दें की तुलसी बहुत ही चमत्कारी पौधा है, विज्ञान की दृष्टि से भी उसमे काफी गुण है, तुलसी के अनेकों उपयोग है, बहुत काम का पौधा है, हिन्दू इसका सम्मान करते है, तुलसी का पौधा बरगद की तरह ही, पीपल की तरह ही 24 घंटे ऑक्सीजन देता है, हिन्दू तुलसी के नीचे दिया जलाते है, कुछ हिन्दू घी का दिया जलाते है. इसे वामपंथी और सेक्युलर तत्व घोर अन्धविश्वास बताते है, इसका विरोध करते है 

पर ये तमाम सेक्युलर, तमाम वामपंथी हर साल 25 दिसंबर को एक नकली पेड़ को खरीदकर लाते है, या नहीं भी लाते तो उसका समर्थन करते है, उसे ये सेक्युलर क्रिसमस ट्री कहते है, वो कटा हुआ पेड़ होता है, या फिर पूरा ही नकली प्लास्टिक का पेड़ होता है, जिसमे  सबकुछ नकली होता है, उस पौधे में ये सेक्युलर सैंकड़ो बल्ब और न जाने क्या क्या लगाते है, और प्रार्थना करते है, हिन्दू तुलसी के नीचे दिया जलाये तो हिन्दू अंधविश्वासी है, परन्तु ये लोग नकली पेड़ पर बल्ब टांग  अपनी आधुनिकता का परिचय जरूर देते है 
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क्रिप्टो-क्रिस्चियन, समझिये कैसे भारत और हिन्दुओ का किया जा रहा है समूल नाश

शनिवार, 9 दिसंबर 2017

क्रिप्टो-क्रिस्चियन, समझिये कैसे भारत और हिन्दुओ का किया जा रहा है समूल नाश

 — 04.12.2017 18:02 Dainik Bharat

ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन क्या है? भारत की जनता में ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन छुपे हुए आस्तीन के सांप है जो भारत की संस्कृति तथा हिंदुओं के लिये एक अनदेखा खतरा है जिनका मूल उद्देश्य भारत को तथा इसकी हिन्दू संस्कृति को धीरे धीरे नष्ट करना है । ।

ऊपर फोटो में देखिये जीसस मुख्य भगवान हैं और दोनों साइड में हमारे असली भगवान को रखा गया है। ऐसा ही साईं के "मंदिरों" में भी होता है। ग्रीक भाषा मे क्रिप्टो शब्द का अर्थ हुआ छुपा हुआ या गुप्त; क्रिप्टो-क्रिस्चियन का अर्थ हुआ गुप्त-ईसाई। इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि क्रिप्टो-क्रिस्चियन कोई गाली या नकारात्मक शब्द नहीं हैं। क्रिप्टो-क्रिस्चियानिटी ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। क्रिप्टो-क्रिस्चियनिटी के मूल सिद्धांत के अंर्तगत क्रिस्चियन जिस देश मे रहतें है वहाँ वे दिखावे के तौर पर तो उस देश के ईश्वर की पूजा करते है, वहाँ का धर्म मानतें हैं जो कि उनका छद्मावरण होता है, पर वास्तव में अंदर से वे ईसाई होते हैं और निरंतर ईसाई धर्म का प्रचार करते रहतें है।

क्रिप्टो-क्रिस्चियन का सबसे पहला उदाहरण रोमन सामाज्य में मिलता है जब ईसाईयत ने शुरुवाती दौर में रोम में अपने पैर रखे थे। तत्काल महान रोमन सम्राट ट्रॉजन ने ईसाईयत को रोमन संस्कृति के लिए खतरा समझा और जितने रोमन ईसाई बने थे उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो वे ईसाईयत छोड़ें या मृत्यु-दंड भुगतें। रोमन ईसाईयों ने मृत्यु-दंड से बचने के लिए ईसाई धर्म छोड़ने का नाटक किया और उसके बाद ऊपर से वे रोमन देवी देवताओं की पूजा करते रहे, पर अंदर से ईसाईयत को मानते थे। जिस तरह मुसलमान 5-10 प्रतिशत होते हैं होतें है तब उस देश के कानून को मनातें है पर जब 20-30 प्रतिशत होतें हैं तब शरीअत की मांग शुरू होती है, दंगे होतें है। आबादी और अधिके बढ़ने पर गैर-मुसलमानों की ethnic cleansing शुरू हो जाती है।

पर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन, मुसलमानों जैसी हिंसा नहीं करते। जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन 1 प्रतिशत से कम होते है तब वह उस देश के ईश्वर को अपना कर अपना काम करते रहतें है जैसा कि और जब अधिक संख्या में हो जातें तो उन्ही देवी-देवताओं का अपमान करने लगतें हैं। Hollywood की मशहूर फिल्म Agora(2009) हर हिन्दू को देखनी चाहिए। इसमें दिखाया है कि जब क्रिप्टो-क्रिस्चियन रोम में संख्या में अधिक हुए तब उन्होंने रोमन देवी-देवताओं का अपमान करना शुरू कर दिया। वर्तमान में भारत मे भी क्रिप्टो-क्रिस्चियन ने पकड़ बनानी शुरू की तो यहाँ भी हिन्दू देवी-देवताओं, ब्राह्मणों को गाली देने का काम शुरू कर दिया। मतलब, जो काम यूरोप में 2000 साल पहले हुआ वह भारत मे आज हो रहा है। हाल में प्रोफेसर केदार मंडल द्वारा देवी दुर्गा को वेश्या कहा जो कि दूसरी सदी के रोम की याद दिलाता है।

क्रिप्टो-क्रिस्चियन के बहुत से उदाहरण हैं पर सबसे रोचक उदाहरण जापान से है। मिशनिरियों का तथाकथित-संत ज़ेवियर जो भारत आया था वह 1550 में धर्मान्तरण के लिए जापान गया और उसने कई बौद्धों को ईसाई बनाया। 1643 में जापान के राष्ट्रवादी राजा शोगुन(Shogun) ने ईसाई धर्म का प्रचार जापान की सामाजिक एकता के लिए खतरा समझा। शोगुन ने बल का प्रयोग किया और कई चर्चो को तोड़ा गया; जीसस-मैरी की मूर्तियां जब्त करके तोड़ दी गईं; बाईबल समेत ईसाई धर्म की कई किताबें खुलेआम जलायीं गईं। जितने जापानियों ने ईसाई धर्म अपना लिया था उनको प्रताड़ित किया गया, उनकी बलपूर्वक बुद्ध धर्म मे घर वापसी कराई गई। जिन्होंने मना किया, उनके सर काट दिए गए। कई ईसाईयों ने बौद्ध धर्म मे घर वापसी का नाटक किया और क्रिप्टो-क्रिस्चियन बने रहे। जापान में इन क्रिप्टो-क्रिस्चियन को "काकूरे-क्रिस्चियन" कहा गया।

काकूरे-क्रिस्चियन ने बौद्धों के डर से ईसाई धर्म से संबधित कोई भी किताब रखनी बन्द कर दी। जीसस और मैरी की पूजा करने के लिए इन्होंने प्रार्थना बनायी जो सुनने में बौद्ध मंत्र लगती पर इसमें बाइबल के शब्द होते थे। ये ईसाई प्रार्थनाएँ काकूरे-क्रिस्चियनों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित करनी शुरू कर दी। 1550 से ले कर अगले 400 सालों तक काकूरे-क्रिस्चियन बुद्ध धर्म के छद्मावरण में रहे। 20वी शताब्दी में जब जापान औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ा और बौद्धों के धार्मिक कट्टरवाद में कमी आई तो इन काकूरे-क्रिस्चियन बौद्ध धर्म के मुखौटे से बाहर निकल अपनी ईसाई पहचान उजागर की।

भारत मे ऐसे बहुत से काकूरे-क्रिस्चियन हैं जो सेक्युलरवाद, वामपंथ और बौद्ध धर्म का मुखौटा पहन कर हमारे बीच हैं। भारत मे ईसाई आबादी आधिकारिक रूप से 2 करोड़ है और अचंभे की बात नहीं होगी अगर भारत मे 10 करोड़ ईसाई निकलें। अकेले पंजाब में अनुमानित ईसाई आबादी 10 प्रतिशत से ऊपर है। पंजाब के कई ईसाई, सिख धर्म के छद्मावरण में है, पगड़ी पहनतें है, दाड़ी, कृपाण, कड़ा भी पहनतें हैं पर सिख धर्म को मानते हैं पर ये सभी गुप्त-ईसाई हैं।

बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन आरक्षण लेने के लिए हिन्दू नाम रखे हैं। इनमें कइयों के नाम राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि भगवानों पर होतें है जिन्हें संघ के लोग भी सपने में गैर-हिन्दू नहीं समझ सकते जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन जिंदगी भर दलित बन के मलाई खाता रहा और जब मरने पर ईसाई धर्म के अनुसार दफनाने की प्रक्रिया देखी तो समझ मे आया कि ये क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। देश मे ऐसे बहुत से क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं जो हिन्दू नामों में हिन्दू धर्म पर हमला करके सिर्फ वेटिकन का एजेंडा बढ़ा रहें हैं।

हम रोजमर्रा की ज़िंदगी मे हर दिन क्रिप्टो-क्रिस्चियनों को देखते हैं पर उन्हें समझ नहीं पाते क्योंकि वे हिन्दू नामों के छद्मावरण में छुपे रहतें हैं। जैसे कि... राम को काल्पनिक बताने वाली कांग्रेसी नेता अम्बिका सोनी क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। NDTV का अधिकतर स्टाफ क्रिप्टो-क्रिस्चियन है। हिन्दू नामों वाले नक्सली जिन्होंने स्वामी लक्ष्मणानन्द को मारा, वे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। गौरी लंकेश, जो ब्राह्मणों को केरला से बाहर उठा कर फेंकने का चित्र अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लगाये थी, क्रिप्टो-क्रिस्चियन थी।

JNU में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले और फिर उनके ऊपर भारत सरकार द्वारा कार्यवाही को ब्राह्मणवादी अत्याचार बताने वाले वामी नहीं, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। फेसबुक पर ब्राह्मणों को गाली देने वाले, हनुमान को बंदर, गणेश को हाथी बताने वाले खालिस्तानी सिख, क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं।

तमिलनाडु में द्रविड़ियन पहचान में छुप कर उत्तर भारतीयों पर हमला करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। जिस राज्य ने सबसे अधिक हिंदी गायक दिए उस राज्य बंगाल में हिंदी का विरोध करने वाले क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। अंधश्रद्धा के नाम हिन्दू त्योहारों के खिलाफ एजेंडे चलाने वाला और बकरीद पर निर्दोष जानवरों की बलि और ईस्टर के दिन मरा हुआ आदमी जीसस जिंदा होने को अंधश्रध्दा न बोलने वाला दाभोलकर, क्रिप्टो-क्रिस्चियन था।
देवी दुर्गा के वेश्या बोलने वाला केदार मंडल और रात दिन फेसबुक पर ब्राह्मणों के खिलाफ बोलने वाले दिलीप मंडल, वामन मेश्राम क्रिप्टो-क्रिस्चियन।

महिषासुर को अपना पूर्वज बताने वाले जितेंद्र यादव और सुनील जनार्दन यादव जैसे कई यादव सरनेम में छुपे क्रिप्टो-क्रिस्चियन हैं। जब किसी के लिवर में समस्या होती है तो उसकी त्वचा में खुजली, जी मचलाना और आंखों पीलापन आ जाता है पर ये सब सिर्फ symptoms हैं इनकी दवा करने से मूल समस्या हल नहीं होगी। अगर लिवर की समस्या को हल कर लिया तो ये symptoms अपने आप गायब हो जाएंगे।

बिना विश्लेषण के देखेंगे तो हिंदुओं के लिए तमाम समस्याएं दिखेंगी वामी, कांग्रेस, खालिस्तानी, नक्सली, दलित आंदोलन, JNU इत्यादि है, पर ये सब समस्याएं symptoms मात्र हैं जिसका मूल है क्रिप्टो-क्रिस्चियन। भारत में आए दिन ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिल रहे हैं जिनमें हिंदुओं पर किये जा रहे अत्याचारों पर इन छद्म लोगों द्वारा कोई संज्ञान नहीं लिया जाता न हीं कोई विरोध किया जाता है
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षडयंत्र का पर्दाफाश : ABP न्यूज ने लड़की पर दबाब डाला संतों के खिलाफ बोलने के लिए

बुधवार, 8 नवंबर 2017

षडयंत्र का पर्दाफाश : ABP न्यूज ने लड़की पर दबाब डाला संतों के खिलाफ बोलने के लिए

 — 14.10.2017 09:38 Azaad Bharat

अक्टूबर 14, 2017 

मुम्बई : इलेक्ट्रॉनिक न्यूज चैनल #ABP न्यूज का चौंकाने वाला खुलासा सामने आया है, ABP न्यूज कैसे #षड्यंत्र करता है और कैसे #झूठी #कहानियां #बनाकर #साजिश रचता है वो वहाँ जॉब करने वाली खुशबू नाम की लड़की ने उनका #पर्दाफाश किया ।

कुछ दिन पहले कांदिवली, मुंम्बई के नम्र मुनि महाराज के खिलाफ ABP न्यूज में आकर एक लड़की यौन शोषण का आरोप लगाया, और कहा कि नम्र मुनि के आश्रम में लड़कियों का यौन शोषण होता है और नम्र मुनि के लेपटॉप में कई लड़कियों के अश्लील फोटो भी मिले हैं । आश्रम में फैशन डिजाइन का खेल खेला जाता है, मॉडलिंग द्वारा अश्लीलता बढाई जाती है ।
लडक़ी द्वारा आरोप लगे, टीवी चैनलों में खूब दिखाया गया लेकिन जैसे ही लड़की वहाँ से भागकर नम्र मुनि के आश्रम में आई और जो सच्चाई बताई वो चौकाने वाली है,मीडिया के झूठ का पोल खुल गया ।

30 वर्षीय लड़की खुशबू ने बताया कि मैं ABP न्यूज में जॉब करती थी और नम्र मुनि से जुड़ी थी । ABP न्यूज की बड़ी एडिटर शिला रावल और हार्दिक हुंडिया था, मैं नम्र मुनि से दीक्षा लेना चाहती थी पर नम्र मुनि ने मना कर दिया जिससे मैंने उनका आश्रम छोड़ दिया, वो शिला रावल और हार्दिक हुंडिया को पता चल गया और मुझे बोला गया कि तू नम्र मुनि के खिलाफ ऐसा ऐसा बोल तो हम तुझे बड़ा बना देंगे और तेरा नाम होगा, वहाँ जॉब कर रही खुशबू ने दबाव में आकर बोल दिया कि मेरे साथ कई बार नम्र मुनि ने यौन शोषण किया और कई लड़कियों का हुआ है । 

आरोप लगाने वाली खुशबू लड़की ने बताया कि मेरे को शिला रावल और हार्दिक हुंडिया ने बताया कि जैसे राम रहीम को एक्सपोज किया है वैसे ही नम्र मुनि का करना है, हार्दिक ने आगे ये भी बताया कि और भी आगे संतो के खिलाफ ऐसा दिखाना है ।

खुशबू ने बताया कि मेरे पर दबाव डाला और मेरे से जबरदस्ती ईमेल करवाये कि लिखो कि मेरे साथ नम्र मुनि ने यौन शोषण किया है और कैमरे के सामने ये सब बोलते समय कैसी एक्टिन करना है वो भी सिखाया गया था । खुशबू को एक स्क्रिप्ट भी दी गई थी जिसमें कैसे नम्र मुनि के खिलाफ केस दर्ज करना है और मीडिया के सामने नम्र मुनि के खिलाफ कैसे बोलना है उसकी जानकारी थी ।

30 वर्षीय खुशबू का स्पष्ट कहना है कि मेरे पर ABP न्यूज एडिटर महिला शिला रावल और हार्दिक हुंडिया ने दबाव डाला था, मैने भी दबाव में आकर ये सब बोल दिया ।
आगे कहा कि और भी संतों को बदनाम करवाने की साजिश रची जा रही है ।

अब आप समझ गये होंगे कि हिन्दू साधु-संतों के खिलाफ कितना बड़ा षडयंत्र चल रहा है, उनको बदनाम करने का, हिन्दू धर्म को खत्म करने की साजिश चल रही है।

आपको बता दें कि हिन्दू संत आशारामजी बापू को भी बदनाम करने के लिए विदेश से भारी फंडिग आती है, विनोद गुप्ता उर्फ भोलानंद ने मीडिया के सामने आकर बताया था। 

भोलानंद ने बताया कि मुम्बई में मेरे योगा सेंटर चलते थे, उसमे इंडिया न्यूज का मुख्य मनीष अवस्थी, इंडिया टीवी का वसीम अख्तर, न्यूज-24 और 'एबीपी न्यूज वाले आकर योगा करने वाली बहनों को बोलते थे कि आप संत आसारामजी बापू के खिलाफ बोलोगेे तो हम आपको करोड़पति बना देंगे, मेरे पास भी संत आशारामजी बापू के खिलाफ स्क्रिप्ट लेकर आये थे उसमे लिखा था कि बापू आसारामजी ने 15-16 लड़कियों का बलात्कार किया, जमीन हड़प ली आदि-आदि लिखा था ।

भोलानंद को बोला गया कि अगर मीडिया में आकर बोलोगे तो हम आपको फ्लेट दिलवा देंगे और 5-6 करोड़ रूपये देंगे । भोलानंद ने बताया कि इंडिया न्यूज का दीपक चौरसिया भी मुझे फोन करके बताता था कि बापू आसारामजी के खिलाफ क्या-क्या बोलना है ।

भारतीय मीडिया में ईसाई मिशनरियों द्वारा वेटिकन सिटी से और मुस्लिम देशों से भारतीय संस्कृति को खत्म करने के लिए और संस्कृति के आधार स्तंभ साधु-संतों को बदनाम करने के लिए भारी फंडिग आती है । क्योंकि साधु-संत धर्मान्तरण में भारी रुकावट डालते हैं ।

सवाल उठता है कि 10-20 हजार की नौकरी करने वाले पत्रकार करोड़पति कैसे बन जाते है? उनकी संपत्ति की जांच होनी चाहिए और संतो के खिलाफ षड्यंत्र रचने वाले मीडिया हाउस के मालिकों एवं पत्रकारों को जेल भेज देना चाहिए ।

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प्रणब मुखर्जी का खुलासा: कांची शंकराचार्य को जेल भेजने के पीछे किसका था हाथ?

बुधवार, 8 नवंबर 2017

प्रणब मुखर्जी का खुलासा: कांची शंकराचार्य को जेल भेजने के पीछे किसका था हाथ?

 — 21.10.2017 21:17 Azaad Bharat

अक्टूबर 21, 2017

देश में किस तरह से #कांग्रेस #हिन्दू #विरोधी है और किस तरह से हिन्दुओं की आस्थाओं पर ही हमला बोलती है यह कांची शंकराचार्य जी के प्रकरण से साफ जाहिर हो जाता है ।
Pranab Mukherjee's disclosure: Who was the man behind sending Kanchi Shankaracharya to jail?
कैसे #कांग्रेस अपने मजहबी #वोट बैंक बढ़ाने के लिए #साधु संतों पर #झूठे #आरोप लगवाकर उनको बेईज्जत करवाते हैं ???
ये सब बातें सामने आई है प्रणब मुखर्जी की नई किताब से...

विदित है कि भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने एक किताब लिखी हैं जिसमें इस प्रकरण का उल्लेख है ।

प्रणब  मुखर्जी ने अपनी किताब 'द कोएलिशन इयर्स 1996-2012' में इस घटना का जिक्र किया है। आज देश फिर से ये सवाल पूछ रहा है और कांग्रेस से पूछना जायज भी है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की किताब ने देश के आगे एक बड़े सवाल को फिर से खड़ा कर दिया है। 

सवाल ये है कि कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती की गिरफ्तारी और उन पर लगाए गए बेहूदे आरोपों के पीछे कौन था? 

नवंबर 2004 में कांग्रेस के सत्ता में आने के कुछ महीनों के अंदर ही दिवाली के मौके पर #शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को हत्या के एक केस में #गिरफ्तार करवाया गया था। जिस वक्त गिरफ्तारी की गई थी, तब वो 2500 साल से चली आ रही त्रिकाल पूजा की तैयारी कर रहे थे। गिरफ्तारी के बाद उन पर अश्लील सीडी देखने और छेड़खानी जैसे घिनौने आरोप भी लगाए गए थे।

प्रणब मुखर्जी ने लिखा है कि "मैं इस गिरफ्तारी से बहुत नाराज था और कैबिनेट की बैठक में मैंने इस मसले को उठाया भी था। 
मैंने सवाल पूछा कि क्या देश में #धर्मनिरपेक्षता का पैमाना सिर्फ #हिंदू संत-महात्माओं तक ही #सीमित है?

  क्या किसी राज्य की #पुलिस किसी #मुस्लिम मौलवी को ईद के मौके पर #गिरफ्तार करने की हिम्मत दिखा #सकती है?" 

गौरतलब है कि जिस तरह से लोगों के सामने ये प्रकरण रखा गया था और लोगों में धारणा है कि कांची पीठ के शंकराचार्य को झूठे मामले में फंसाकर गिरफ्तार करवाने की पूरी #साजिश उस वक्त रही मुख्यमंत्री #जयललिता ने अपनी #सहेली #शशिकला के इशारे पर #रची थी। उस वक्त इस सारी घटना के पीछे किसी जमीन सौदे को लेकर हुआ विवाद बताया गया था।

लेकिन प्रणब मुखर्जी ने इस मामले को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। 
प्रणब मुखर्जी ने किताब में लिखा है कि उन्होंने केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में गिरफ्तारी को लेकर कड़ा विरोध जताया। 
अब स्पष्ट है कि वरिष्ठ मंत्री के तौर पर जिस तरह से उन्होंने विरोध दर्ज कराया, उन्हें इस बात की जानकारी रही होगी कि #गिरफ्तारी के #पीछे #केंद्र सरकार की सहमति ली गई है। 

ये वो दौर था जब सोनिया और जयललिता के बीच काफी करीबियां थी । आपको ये भी बता दें कि दक्षिण भारत में ईसाई धर्म को बेरोक-टोक फैलाने के लिए कांची के शंकराचार्य काफी रोष में थे और इसके खिलाफ थे। जिसके बाद इनको जानबूझकर फंसाया गया। 

जिस समय मीनाक्षीपुरम में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की घटनाओं से पूरा हिंदू समाज व्यथित था, तब कांची मठ ने सचल मंदिर बनाकर उन्हें दलित बस्तियों में भेजा और कहा कि अगर वो मंदिर तक नहीं आ सकते तो मंदिर उन तक पहुंचेगा। सामाजिक बराबरी के लिए कांची मठ ने बहुत कोशिश की, यही कारण था कि वो ईसाई मिशनरियों को खटक रहे थे।

कांग्रेस शासन काल में जब जयेंद्र सरस्वती को झूठे केस में फंसाया गया तब उनकी रिहाई के लिए हिन्दू संत बापू आसारामजी ने जंतर-मंतर पर धरना दिया था बाद में वहाँ पर तत्कालीन प्रधानमंत्री आदि अनेक नेता आ गए थे और बापू आशारामजी की लाखों भक्तों की भीड़ हो गई थी । बाद में इतना दबाव बना कि उनकी रिहाई करनी पड़ी।

उस समय (2004 नवम्बर) में बापू आशारामजी ने बोला था कि अब हमारे आश्रम और हमारे खिलाफ षडयंत्र चलेगा, हमको फंसाने की कोशिश करेंगे और बाद में हुआ भी ऐसा ही, उनके खिलाफ मीडिया में खूब कुप्रचार हुआ और बाद में बिना सबूत जेल भी जाना पड़ा ।

#कांग्रेस काल में साध्वी प्रज्ञा , स्वामी असीमानंद, शंकराचार्य, डीजी वंजारा, कर्नल पुरोहित आदि अनेक #हिंदुत्वनिष्ठों को #जेल भिजवाया गया, सोनिया वेटिकन सिटी के इशारे पर काम कर रही थी जो भी साधु-संत या हिन्दू कार्यकर्ता ईसाई धर्मान्तरण के आड़े आता था उनको जेल भिजवाया जाता था ।

आपको बता दें कि आज भले सरकार बदल गई हो लेकिन हिन्दू आस्थाओं के ऊपर चोट कम नही हुई है आज भी कई हिन्दू #साधु-संतों पर #षड्यंत्र चल रहा है उनके खिलाफ खूब #मीडिया #ट्रायल चल रहे हैं, जेल भेजा जा रहा है और कांग्रेस काल में जो शिकार हुए हैं, वो भी आजतक #बिना #सबूत सालों से जेल में है ।

अभी देश में अधिकतर ईसाई मिशनरियां खूब पुरजोर लगा धर्मान्तरण करवा रही हैं । विदेशी फंड से चलने वाली कई #मीडिया पादरियों और मौलवियों के कुकर्मो को छुपाकर हिन्दू #साधु-संतों को #बदनाम करने में लगी है क्योंकि उनका उद्देश्य है कैसे भी करके हिन्दू धर्म को #खत्म करना, उसके लिए वो मीडिया को पैसे देकर हिन्दू साधु-संतों को बदनाम करवा रहे हैं, जिससे जनता की श्रद्धा कम हो जाये और आसानी से धर्मान्तरण हो सके ।

अभी भी हिन्दू नही जगा तो कब जगेगा..??

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ईसाई धर्म अपनाकर पछता रहे हैं लाखों दलित परिवार

बुधवार, 8 नवंबर 2017
ईसाई धर्म अपनाकर पछता रहे हैं लाखों दलित परिवार 

दलितों को बहला-फुसलाकर धर्मांतरण करा रही ईसाई मिशनरी उनके साथ बेहद बुरा सलूक कर रही हैं। ईसाई बन चुके दलितों के एक संगठन ने संयुक्त राष्ट्र को चिट्ठी लिखकर अपने साथ भेदभाव की शिकायत की है। उनकी ये शिकायत वेटिकन के खिलाफ भी है। इन लोगों की शिकायत है कि सामाजिक भेदभाव से छुटकारा दिलाने के नाम पर मिशनरियों ने उन्हें ईसाई तो बना लिया, लेकिन यहां भी उनके साथ अछूतों जैसा बर्ताव हो रहा है। कई चर्च में दलित ईसाइयों के घुसने पर भी एक तरह से पाबंदी लगी हुई है। नाराजगी इस बात से है कि ईसाइयों की सर्वोच्च संस्था वेटिकन इस भेदभाव को खत्म करने के लिए कुछ नहीं कर रही। दिल्ली में यूएन के दफ्तर के जरिए ये शिकायत कुछ वक्त पहले भेजी गई है। कुछ वक्त पहले न्यूज़लूज़ पर हमने दिल्ली के सेंट स्टीफेंस कॉलेज की खबर बताई थी, जहां प्रिंसिपल की भर्ती के लिए निकले विज्ञापन में साफ कहा गया था कि कैंडिडेट मारथोमा सीरियन चर्च का होना चाहिए। 
ईसाई धर्म में ज्यादा भेदभाव' 

दलित क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट (डीसीएलएम) और मानवाधिकार संस्था विदुथलाई तमिल पुलिगल काची ने कहा है कि "वेटिकन और इंडियन कैथोलिक चर्च भारतीय दलित ईसाइयों को तुच्छ नज़र से देखते हैं। हर जगह उन ईसाइयों को प्राथमिकता दी जाती है जो उनकी नजर में उच्च वर्ग के हैं। यह भेदभाव धार्मिक, शैक्षिक और प्रशासनिक सभी क्षेत्रों में हो रहा है।" दलित ईसाइयों के संगठनों ने संयुक्त राष्ट्र से फरियाद की है कि वो वेटिकन पर इस बात का दबाव डालें ताकि वो भारतीय दलितों के साथ दोहरा रवैया छोड़ें। पिछले कुछ दशकों में लाखों की संख्या में दलितों ने ईसाई धर्म अपना लिया है, लेकिन इनमें से ज्यादातर खुद को ठगा महसूस करते हैं क्योंकि अब उनकी सामाजिक स्थिति पहले से बदतर है। ऐसी घटनाएं मीडिया में भी नहीं आने पातीं। इसके उलट हिंदू धर्म में हो रहे सुधारों के कारण जाति-पाति के आधार पर भेदभाव काफी हद तक कम हुआ है। यह भी पढ़ें: धर्मांतरण कराने वाली सबसे बड़ी एजेंसी देश छोड़कर भागी 

'दलितों के लिए अलग कब्रिस्तान' 

दलित ईसाई संगठनों की कई शिकायतें हैं, लेकिन इनमें सबसे गंभीर हैं वो सामाजिक भेदभाव जिनके नाम पर उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए उकसाया गया था। दलित ईसाई संगठनों के मुताबिक ज्यादातर जगहों पर कैथोलिक ईसाई पसंद नहीं करते कि उनके सेमेंटरीज़ (यानी कब्रिस्तानों) में दलित ईसाइयों को दफनाया जाए। वो उन्हें कमतर मानते हैं लिहाजा उनकी जगह कोई सुनसान कोना या अलग जगह होती है।यहां तक कि कई चर्च में भी दलित जाति के ईसाइयों के बैठने की जगह अलग और पीछे होती है। क्रिसमस पर निकलने वाली शोभा यात्राएं दलित ईसाइयों के मोहल्लों में नहीं जातीं। दलित ईसाइयों को पढ़ा-लिखा होने के बावजूद ज्यादातर सहायक, ड्राइवर या इससे भी निचले दर्जे की नौकरियां दी जाती हैं। इसकी शिकायत कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया से भी की जा चुकी है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। क्योंकि इस पर खुद को प्योर ब्लड का बताने वाले ईसाइयों का कब्जा है। इस भेदभाव का नतीजा है कि एक पीढ़ी पहले धर्मांतरण करने वाले कई दलित परिवार वापस सनातन धर्म अपनाने की सोच रहे हैं। अकेले केरल में पिछले एक दशक में 100 के करीब परिवार वापस हिंदू धर्म अपना चुके हैं। 

दलित ईसाइयों पर कुछ तथ्य: 
देश में कुल कैथोलिक ईसाई आबादी का 70 फीसदी दलित जातियों से धर्मांतरण करने वाले लोग हैं। लेकिन चर्च में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ 4 से 5 फीसदी है। 
पादरी और बिशप जैसे पदों के लिए दलित ईसाइयों का चुना जाना लगभग नामुमकिन है। अगर कोई बनता भी है तो उन इलाकों के लिए जहां उच्च वर्ग के पादरी जाना पसंद नहीं करते। 
देश भर में 200 से ज्यादा सक्रिय बिशप में से सिर्फ 9 दलित समुदाय से आते हैं। 
ज्यादातर दलित ईसाई परिवार पहले की तरह आपस में ही शादी-ब्याह करते हैं, क्योंकि कोई भी कुलीन ईसाई परिवार उनसे पारिवारिक रिश्ता नहीं रखता। 

ये तस्वीर केरल के आलपुड़ा की है, जहां पिछले कुछ साल में भारी संख्या में ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके लोगों ने भेदभाव से परेशान होकर वापस हिंदू धर्म अपना लिया।
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मूल निवासी और विदेशी आर्य में न फंसे हिन्दू, हिन्दुओ को जातियों में तोड़ने का ये है जेशुआ प्रोजेक्ट

बुधवार, 8 नवंबर 2017

मूल निवासी और विदेशी आर्य में न फंसे हिन्दू, हिन्दुओ को जातियों में तोड़ने का ये है जेशुआ प्रोजेक्ट

वामपंथियों और हिन्दुओ के समूल नाश का मिशन लेकर चलने वाले मिशनरियों की बातों के कारण अक्सर लोग उलझ जाते है कि आर्य बाहर से आये और दलित भारत के ही है

कुछ अति उत्साही लोगो ने तो अपने को मूलनिवासी तक भी घोषित कर चुके है। लेकिन उनसे मानव अर्थात होमो इरेक्टस और होमो सेपियंस के बारे में पूछा जाता है तो वे या तो बगले झांकने लगते है या तो कुतर्क पर उतर जाते है। हमने यह लेख यहाँ पर पोस्ट किया है जो सटीक और तथ्यात्मक है,,,हा इसे समझने के लिए जातिय सिंड्रोम से बाहर निकलना होगा।

जिस देश का नाम ही 'आर्यव्रत' हो, उस देश में भारत बाहर से आए और इस बात का सभी बुद्धिजीवियों द्वारा समर्थन करना कितनी बड़ी बौद्धीक दरिद्रता का प्रतीक है। दरिद्रता हो भी क्यों नहीं, क्योंकि यही तो वह (अंग्रेज) चाहते थें कि हम अपना वास्तविक इतिहास भुल जाए। हम हमारे ही देश में बेगाने बन कर रह जाए। मैकॉले महाशय जहां-कही भी होगे, इस बात पर जश्न अवश्य मना रहें होगे। अब थोडा आर्य' शब्द के अर्थ पर गौर करते हैं, 'आर्य' शब्द का जो अर्थ शब्दकोशों में दिया गया है, इससे यह पता चलता है, कि वह किन लोगों के लिए प्रयोग में लाया जाता हैं, लेकिन इस बात का पता नहीं चलता कि उसकी उत्पत्ति कैसे हुई। 

कहते हैं किसी शब्द की वास्तविकता की खोज़ करनी हो तो, उस शब्द की उत्पत्ति पर ध्यान देना चाहिए। इतिहास के वास्तविक अनुसंधानकर्ता श्री नरेंद्र पिपलानी के अनुसार आर्य शब्द 'अर' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'आधा' होता है। अब यह आधा क्या हैं आपने देखा होगा कि, सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है, पूर्व से उदय होकर पश्चिम में अस्त होने तक वह आधा चक्र पूरा करता है, इसलिए हम उसे पूरा नहीं देख पाते हैं। इसी बात को ध्यान में रखकर आधे दिखाने देने वाले सूर्य की आराधना करने वाले लोग को 'आर्य' नाम दिया है, क्योंकि वह सूर्य के उपासक थे, यह सर्वविदित हैं। 

अब यह धारणा कि, भारत में आर्य बाहर से आए जानबूझकर कुछ अंग्रेज विद्वानों ने फैलाई थी। यह धारणा इस देश में फैलाने के पीछे उनकी इस देश के वास्तविक भूमीपूत्रों को भ्रम में डाल कर उन्हें स्वतंत्रता की लड़ाई से अपना ध्यान दूसरी तरफ मोडऩा था, ताकि वे इस भारत भूमी पर अपना अधिकार न बता सकें। आर्य एकमेव ऐसी प्रजाति है, जिसके पूर्वज केवल भारत में ही पाए जाते हैं। आपने देखा होगा कि जब किसी व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की जमीन पर अपना कब्जा करना होता है, तो वह यह साबीत करने की कोशिश करता हैं कि यह भूमी तुम्हारी नहीं है। उसके वास्तविक मालिक को भ्रम में डाल दिया जाए और ऐसी स्थिति उत्पन्न की जाए कि, वास्तविक मालिक भी चक्कर में पड़ जाए। आपने देखा होगा कि कुछ लोग प्लॉट के नक्शे में किस प्रकार छेड़छाड करते हैं। 

आधी फीट जमीन हथियाने के कई सारे मामले देश की न्यायालयों के पास लंबीत पड़े हैं। जिस प्रकार पाकिस्तान कश्मीर पर अपना हक जमाने के लिए किस प्रकार की तिकडमबाजी करने में दिन रात लगा रहता है। पाकिस्तान 'ऑक्यूपाइड कश्मीर (पीओके)' शब्द आपने कई बार सुना होगा, इसका सरल शब्दों में अर्थ जो जमीन उसकी नहीं है उसको हथियाने की नाकाम कोशिश करना है, जिसे हम 'अतिक्रमण' कहते हैं और अतिक्रमण का अंत क्या होता है, यह भी आप भलिभॉति जानते हैं!

'आर्य भारत में बाहर से आए' यह दिखाने के लिए अंग्रेजों ने जानबूझकर यह भ्रम इस देश के बुद्धिजीवियों में फैलाया ताकि यह जन-जन तक पहॅुच जाए। क्योंकि हमारे देश के कुछ विदेशी डीग्रीधारी तथाकथित बुद्धिजीवि यह कार्य मुफ्त में ही कर देंगे, यह अंग्रेजों को अच्छी प्रकार से पता था।

एक भी भारतीय यह स्वीकार नहीं कर सकता कि, उसके पूर्वज भारत में कही बाहर से आए हो। यदि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद और शास्त्रों का गहराई से अध्ययन करें तो पता चलता है, भारत की प्राचीन भाषाओं से विश्व की सभी भाषाओं में शब्द गए है। इसीलिए संस्कृत भाषा के शब्दकोश में सर्वाधिक शब्द पाए जाते हैं, दुनिया की किसी भाषा में इतने शब्द नहीं पाए जाते हैं, क्योंकि संस्कृत से ही यह शब्द अन्य देशों की भाषाओं में गए है। 

शब्द दुसरे देशों में उडक़र तो जा नहीं सकते किसी व्यक्ति या परिवार के माध्यम से ही यह शब्द गए होगे। हमारे पूर्वज समुद्र के मार्ग से और नेपाल, पाकिस्तान और अन्य युरोपीय देशों में व्यापार करने के लिए प्राचीन काल से जाते रहें हैं, जिस प्रकार आज कोई व्यक्ति अमेरिका नौकरी या व्यापार करने के लिए जाता है, तो अपने साथ कुछ जीवनावश्यक वस्तुं, परिवार के कुछ सदस्यों और धर्मग्रंथों को लेकर जाते थें, यह सभी व्यक्ति की भाषा के संवाहक हैं। 

इसीलिए ग्रीक, लैटीन, जर्मन और अन्य भाषाओं में भी पाए जाने वाले शब्द बिलकुल हमारी प्राचीन भाषा संस्कृत में पाए जाते हैं, क्योंकि वह संस्कृत से ही उन भाषाओं में गये हैं, इसीलिए ऑक्सफोर्ड की डिक्शनरी में भी जीन शब्दों की उत्पत्ति नहीं दी गई हैं, ऐसे कई सारे शब्दों की उत्पत्ति संस्कृत के शब्दों को मिलाकर देखने से मिल जाती है, जैसे अंग्रेजी की 'Full' शब्द की उत्पत्ति 'प्रफुल्ल' शब्द से हुई, इसे कोई झुठला नहीं सकता, क्योकि स्नह्वद्यद्य शब्द में डबल एल कहा से आया इस शब्द के उच्चारण में डबल एल का कोई उच्चारण नहीं होता है, मात्र एक ही एल का उच्चारण होता है, अंग्रेजों (विदेशियों) ने 'प्रफुल्ल' शब्द का फूल उच्चारण तो कर दिया लेकिन डबल एल क्यों है, वह नहीं बता सकते। इसी प्रकार अंग्रेजी की ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में कई शब्दों की व्युत्पत्ति Unknown अर्थात 'अज्ञात' दी जाती है, क्योंकि उन्हें ही पता नही कि वह शब्द कैसे बना।

ऐसे कई शब्दों को बताया जा सकता है, जो पश्चिमी देशों में प्रचलन में कहा से आए हैं किसी को पता नहीं। यह तो बात हो गई शब्दविज्ञान की जो भाषा विज्ञान का ही एक अंग है। अब बात करते हैं, डीएनए की। डिएनए विशेषज्ञों ने भी यह माना है कि, पूरे विश्व के लोगों के डीएनए सैम्पल एकत्रीत किए जाए तो उनके सात-आठ प्रकार ही पाए जाऐंगे, इससे अधिक नहीं क्योंकि हमारी प्राचीन धारणा कि सप्त ऋषियों से मानवों के परिवारों के हम वंशज हैं, 'गोत्र प्रणाली' इस धारणा को सिद्ध करती हैं। प्राचीन काल से ही भारत से लोग ज्ञानप्रसार, व्यापार और अन्य कारणों से बाहर जाते रहतें हैं। भारत से लोग बाहरी देशों में जाकर बसते हैं, न कि बाहर से भारत में आकर बस गए।

अब, भौगोलिक दृष्टीकोण से देखते हैं, कि यह धारणा कहा तक सही बैठती है। आज सात खंडों में पृथ्वी की पूरी जमीन को विभाजित किया गया है। इन सप्तद्वीप और नवखंडों का वर्णन प्राचीन साहित्य में भी आता है। क्योंकि यही बाद में कॉन्टीनेंट में परिवर्तित हो गए।

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नाम चंद्र कुमार और "पादरी", चौंकिए मत यही तो पूरा खेल चल रहा है भारत में

बुधवार, 1 नवंबर 2017

नाम चंद्र कुमार और "पादरी", चौंकिए मत यही तो पूरा खेल चल रहा है भारत में

 — 30.10.2017 10:07 Dainik Bharat

क्या आपने पटना में गिरफ्तार पादरी चंद्र कुमार की गिरफ्तारी की खबर सुनी ??, सुनी भी होगी तो मीडिया ने आपको बताया होगा की पटना में एक बलात्कारी को 2 महिलाओं के बलात्कार के आरोप में पुलिस ने गिरफ्तार किया है, पर रुकिए इतना ही नहीं है 

ये शख्स एक पादरी है, ईसाई पादरी, पर नाम इसने हिन्दुओ वाला ही रखा हुआ था, ताकि आसानी से हिन्दुओ को मुर्ख बना सके, आपने ये खबर सुनी है की पटना में बलात्कारी पादरी गिरफ्तार हुआ है जिसका नाम चंद्र कुमार है, नही सुनी होगी, क्योकि ये कोई बाबा,साधु, संत या मुनि तो थे नही बल्कि ये खुद धर्म परिवर्तित करके बने पादरी थे ।

ये श्रीमान पटना में लोगों को ईसाई बनाने में लगे थे । इन्होंने पैसे का लोभ देकर कई लोगों को ईसाई बनाया । उन्ही में 2 महिलाएँ भी थी । उनको ईसाई बनाने के बाद ये श्रीमान महीनों तक उनका देह शोषण करते रहे ।गिरफ्तारी और जाँच के बाद देह शोषण की पुष्टि भी हो गयी । 

मीडिया में खबर सिरे से गायब है । बाकी पादरी की गुफा, मोबाइल, जैसी सनसनी खड़ी करने की हिम्मत नही है मीडिया में, इन्हें तो किसी भी तरह हिन्दू युवा पीढ़ी को धर्मगुरुओं से विमुख करना है । जो हिन्दू सारे साधु संतों को मीडिया के जाल में फरेबी, ढोंगी मान चुके है उन्हें 2 चीजे ध्यान रखनी चाहिए सबसे ज्यादा बलात्कारी और ढोंगी और पाखंडी विशेष मजहब वाले ही होते है 
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डेरा कांड का लाभ लेते हुए, अब हरियाणा पर है ईसाई मिशनरियों की ‘गिद्ध दृष्टि

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

डेरा कांड का लाभ लेते हुए, अब हरियाणा पर है ईसाई मिशनरियों की 'गिद्ध दृष्टि

डेरा कांड का लाभ लेते हुए, अब हरियाणा पर है ईसाई मिशनरियों की 'गिद्ध दृष्टि'

डेरा कांड का लाभ लेते हुए, अब हरियाणा पर है ईसाई मिशनरियों की 'गिद्ध दृष्टि

डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम के जेल जाने से सबसे ज्यादा खुश ईसाई मिशनरियां हैं। चूँकि करोड़ो लोगो की डेरा के प्रति श्रधा को ठेस पहुंची है इसलिये अब इन ईसाई मिशनरियों की  उम्मीदें और प्रवल हो गयीं हैं की आराम से लाखों हिंदुओं का धर्मांतरण करवा पाएंगी।

इसके लिए ईसाई मिशनरियों ने तैयारी शुरू भी कर दी है। शुरुआत ईसाई मिशनरियों के लिए काम करने वाले एनजीओ ने की है। ये लोग उन इलाकों में जा रहे हैं जहां पर डेरा सच्चा सौदा से जुड़े लोगों की सबसे ज्यादा आबादी रहती है।

विश्वशनीय सूत्रों से  मिली जानकारी के मुताबिक कोशिश इस बात की है लोगों के मन में यह बात डाली जाए कि वो लोग पीड़ित और दुखी हैं और उनका धर्म उनकी रक्षा नहीं कर पाया। इससे जुड़े लिटरेचर और दूसरी प्रचार सामग्री तैयार करने का काम भी शुरू किया जा रहा है। इसके अलावा बड़े पैमाने पर बाइबिल बांटने की भी तैयारी है।


इस काम में सेंट पॉल चर्च और बिलीवर्स चर्च सबसे ज्यादा सक्रिय बताए जा रहे हैं। सच्चा सौदा और ऐसे कुछ डेरों के कारण ही हरियाणा के पश्चिमी और पंजाब के दक्षिणी और पूर्वी जिलों में ईसाई मिशनरियां अपने पैर जमाने में अब तक लगभग नाकाम रही हैं। इन हालात में यह देखना दिलचस्प होगा कि हरियाणा की बीजेपी सरकार उनसे कैसे निपटती है।

डेरा का स्थान लेने की कोशिश जोरो पर शुरू हो गयीं हैं

डेरा सच्चा सौदा से जुड़े ज्यादातर लोग समाज के निचले तबके के हैं। इन्हें कथित ऊंची जातियों की तरफ से तरह-तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में डेरे के साथ जुड़ना कहीं न कहीं प्रतिष्ठा की बात भी होती है। इनमें से ज्यादातर दलित सिख और हिंदू समाज से आते हैं। डेरा के अपने मंदिर होते हैं, जिनमें उनके साथ कोई भेदभाव नहीं होता। इसके अलावा पढ़ाई और इलाज़ जैसी बुनियादी सुविधाएं लोगों को लगभग मुफ्त में मिल जाती हैं।

डेरा सच्चा सौदा भी अपने इसी ढांचे के कारण अब तक ईसाई मिशनरियों को पनपने से रोकता रहा है। सिरसा और आसपास के कई जिलों में खराब पानी के कारण पिछले कुछ साल में घुटनों और कैंसर जैसी बीमारियां तेज़ी से बढ़ीं। डेरा के अस्पतालों में इनका मुफ्त इलाज होता रहा है। लेकिन अब ईसाई मिशनरियों को ऐसे अस्पताल खोलने का मौका मिल जाएगा। किसी भी इलाके में धर्मांतरण करवाने का उनका पहला कदम होता है कि वहां पर एक अस्पताल और स्कूल खुलवाया जाता है। हमें मिली जानकारी के मुताबिक हरियाणा के हर नगर पालिका क्षेत्र के आसपास कम से कम एक मिशनरी स्कूल खोलने का लक्ष्य रखा गया है।

साजिश के तहत दलित अत्याचार का सहारा लेकर कर रहे हैं धर्म परिवर्तन

हरियाणा में दलितों पर कथित अत्याचार के मामलों का इतिहास रहा है। राज्य में बीजेपी सरकार आने से पहले हिसार के मिर्चपुर और करनाल के सग्गा गांव की घटनाएं काफी चर्चित हुई थीं।

बीजेपी सरकार के आने के बाद 2015 में बल्लभगढ़ में एक दलित परिवार को घर के अंदर जिंदा जलाने का मामला सामने आया था। इसके कुछ दिन बाद ही सोनीपत जिले के गोहाना में एक दलित लड़के की संदिग्ध हालात में मौत हुई थी।

डेरा कांड का लाभ लेते हुए, अब हरियाणा पर है ईसाई मिशनरियों की 'गिद्ध दृष्टिइन सभी घटनाओं का ईसाई मिशनरियों ने भरपूर फायदा उठाया। ये मामले जिन जिलों के हैं वहां पर पिछले कुछ साल में कई बड़े चर्च खड़े हो चुके हैं। भारी संख्या में लोगों को ईसाई बनाया गया है। अक्सर ये आरोप लगता है कि ये ज्यादातर मामले एक साजिश के तहत करवाए गए, ताकि दलितों में असुरक्षा की भावना पैदा करके उसका फायदा उठाया जा सके।

बल्लभगढ़ में परिवार को जिंदा जलाने का मामला तो पूरी तरह फर्जी निकल गया था। इसके बावजूद वहां पिछले साल अगस्त तक 100 से ज्यादा परिवारों ने ईसाई धर्म अपना लिया था। फिलहाल डेरा सच्चा सौदा के कमजोर होने से इन मिशनरियों को हरियाणा का एक बड़ा इलाका खुले मैदान की तरह मिल गया है, जहां वो अपनी मर्जी से जो चाहे कर सकती हैं।

अनेक जाने-माने लोगों ने सोशल मीडिया के जरिए इस मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है

ईसाई मशीनरी अपने एक और मिशन में कामयाब हुई.

स्वामी नित्यानंद, आसाराम बापू, बाबा रामपाल और अब गुरमीत राम रहीम.

अगला नम्बर बाबा रामदेव का..?

— Samip Thakur (@sameepthakur) August 25, 2017

राम रहीम सरीखे बाबाओं की सफलता के पीछे कहीं न कहीं जाति आधारित भेदभाव है, जो कि न सिर्फ हिंदू बल्कि सिख, इस्लाम और ईसाई धर्म में भी पैठा है।

— aradhana mukti (@aradhanamukti) August 26, 2017

वर्ल्ड माफिया का काम हो गया ना
डेरा के 6 करोड़ भक्तो का दिल टूट गया या तो ईसाई बन जाओ या नास्तिक

ओर कुछ कह रहे हैं कि बाबा गया!!

— Ikka Singh (@70sinhsodha) August 27, 2017

ईसाई मिशनरियाँ डेरा के ग़रीब भक्तों को लालच देकर अपने साथ जोड़ सकती हैं..ऐसे में आप जैसे सन्तों की भूमिका अहम होगी @ShriguruPawanji

— RajaniKant Singh (@rajhnv) August 29, 2017

Missionary schools will grab lakhs of poor students from Dera run schools. Anyone thinking of issues beyond one man's scandal?

— Rajiv Malhotra (@RajivMessage) August 28, 2017


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