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Ek बार जरूर पढ़ें , Dear Girls ,, एक ऐसी post डालने जा रहा हूं जिसे पढ़कर कुछ लड़के और लड़कियां मुझे गालियां देंगे But i don't care ये जरूरी था ।।

शनिवार, 2 जून 2018

Ek बार जरूर पढ़ें , Dear Girls ,,
एक ऐसी post डालने जा रहा हूं जिसे पढ़कर कुछ लड़के और लड़कियां मुझे गालियां देंगे
But i don't care ये जरूरी था ।।
आजकल देखा जाये तो ज्यादातर relations सिर्फ timepass or sex के लिए बनाते हैं boys और ये सच है ...pyar क्या है कई लोगों को पता तक नही,बस timepass के इरादे से भोली भाली लड़कियोंको sex के लिए True love का झांसा देकर बनाये जाते है personal relations ..मै ये नही कहता की गलती अकेली boys की है लड़कियों की भी होती है ।।
वो क्यों तो सुनो......
Dear Girls..... पहली बात ..अगर आपका bf आपसे True love करता है तो i am 100%sure वो आपसे शादी से पहले ये रिस्ता कभी नही बनायेगा और ना ही आपको मजबूर करेगा ।
आजकल कुछ boys पहले तो लड़की को True love का एहसास कराते हैं और फिर लड़की को जब उनकी आदत हो जाती है फिर उन्हें ये रिस्ता बनाने को मजबूर करते हैं ।फिर कुछ लड़कियां अपना relations बचाने के लिए मजबूरन ये रिस्ता बनाती हैं क्योंकि इनको यकीन दिलाया जाता है कि शादी आपसे ही करेगा but ऐसा कुछ नही होता ...लड़की को use करके छोड़ दिया जाता है।।
Dear Girls... यहाँ एक बात बोलना चाहता हूं लड़की का सबकुछ लड़की का गहना लड़की का गरूर होती है इज्जत ।। इज्जत गयी तो समझो लड़की का सब कुछ गया । Girls आप gf बाद में पहले किसी की बहन या बेटी हो ।
आपको इस रास्ते ले जाने वाले बहुत मिलेंगे हर मोड़ पर मिलेंगे , आपकी frnds भी आपको इस रास्ते ले जा सकती हैं किसी का भरोसा मत करना ...अपने पापा की तरफ देखो अपने भाई की तरफ देखो ।
आपके परिवार की इज्जत आपके हाथ में है समझ रही हो ना.....बात छोटी सी नही है ये आपकी पूरी जिंदगी बरबाद कर सकती है । आपके पापा और भाई की life भी आपसे जुडी है ।
जमाना बहुत खराब है ..plzz गौर करना एक बार ..
आपकी जिंदगी है कोई आपको इस रास्ते पर जबरदस्ती नही ले जा सकता बस अपने दिल से बचना और भरोसा मत करना किसी पर भी और इस रास्ते पर मत जाना ।।
आपको मजबूर करेंगे लोग ..Strong बनो ।
Pyar के अलावा भी रिस्ता है भाई और पापा का उनका ख्याल कर लेना , बाकि आप समझदार हो ही but मैंने देखा है लड़कियां प्यार में ही उल्लू बनती हैं plzzz Dil के साथ दिमाग भी use करो ...safe रहो ,धन्यवाद् ।
अगर बुरी लगे तो बेशक गालियां दे देना, मेरी भी बहन है और मै ये नही चाहता की कोई लड़की इस दलदल में जाये ।।
Plzzz अगर Agree हो तो 1 share मेरे लिए क्योंकि जो new लड़कियां है उन्हें बताना जरूरी है ये सब
Aapka pyara Dost #
Mera post karne ka y उद्देश्य nhi kisi ko heart ya
# impressed
All gys muture........
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# one___sided___lover
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क्या आप जानते है ? चेन्नई में ईसाई मिशनरियो का काला कारनामा छिपाने के लिए श्रीदेवी के लिए घड़ियाली आँसू बहाये जा रहे है ! ताकि लोगो का ध्यान इस काण्ड से हट जाए !

शनिवार, 12 मई 2018

क्या आप जानते है ?
चेन्नई में ईसाई मिशनरियो का काला कारनामा छिपाने के लिए श्रीदेवी के लिए घड़ियाली आँसू बहाये जा रहे है ! ताकि लोगो का ध्यान इस काण्ड से हट जाए !
ये है तांबरम, चेन्नई के निकट सेंट जोसेफ़ करूनई-इल्लम ओल्डएज होम मतलब वृद्धाश्रम ! इनके यहाँ छापा पड़ा 21-22 तारीख को जब इस संस्था के ही एक गाड़ी में एक बूढ़ी औरत की 'बचाओ-बचाओ' की आवाज़ लगा रही थी रोड पे इसकी गाड़ी रोकी गई और उस गाड़ी से दो वृद्ध जनों को बचाया गया।
फिर इसके बाद इस ओल्डएज होम पे छापा पड़ा जहाँ इंटेलिजेंस वालों के होश उड़ गए। ओल्डएज होम पर लाशों का रैक बना हुआ था बड़े-बड़े बक्सों के अंदर और वो लाश थी ? जी नहीं केवल मांस के लोथड़े ही बचे थे।
1600 से ऊपर ऐसे लोथड़े थे। इससे पहले तो पता नहीं कितने ही ऐसे लोथड़े मिट्टी में मिल गए होंगे। इनकी हड्डियां और अंग विदेशों में सप्लाई कर दिए जाते हैं, जहाँ बहुत माँग हैं इन सबकी।
हॉस्पिटलस से ये लाशें लाते हैं और हड्डियों को निकालने का काम करते हैं। इनके ही वृद्धाश्रम से पता नहीं कितनों को मार कर इनकी हड्डियां और ऑर्गन्स बेचे जाते हैं। सड़क किनारे से बुजुर्गों को उठा के लाते हैं सोशल सर्विस के नाम पर जो भी तगड़ा मिलता है सोशल सर्विस के नाम से और अंदर खाने ये सब कुकृत्य किया जाता है।
मेन स्ट्रीम मीडिया में नहीं मिला न ये सब? 
कैसे मिलेगा ?
सेंट फेंट वालों के यहाँ ऐसे चीज थोड़े न होते हैं, ऐसे कृत्य तो केवल बाबाओं के यहां ही होते हैं।
खैर मीडिया आज श्रीदेवी की अंतेष्टि में ही सारा दिन निकाल देगी और आखिर में ये खबर गायब हो जाएगी .

noreply@blogger.com (Vivek Surange)

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ईसाई मिशनरी ने अपने अथाह साधनों के दम पर सम्पूर्ण विश्व के सभी प्रकार के मीडिया में अपने आपको शक्तिशाली रूप में स्थापित कर लिया है।

शनिवार, 12 मई 2018

ईसाई मिशनरी ने अपने अथाह साधनों के दम पर सम्पूर्ण विश्व के सभी प्रकार के मीडिया में अपने आपको शक्तिशाली रूप में स्थापित कर लिया है। उन्हें मालूम है कि लोग वह सोचते हैं, जो मीडिया सोचने को प्रेरित करता है। 
इसलिए किसी भी राष्ट्र में कभी भी आपको ईसाई मिशनरी द्वारा धर्म परिवर्तन के लिए चलाये जा रहे गोरखधंधों पर कभी कोई समाचार नहीं मिलेगा। जबकि भारत जैसे देश में दलितों के साथ हुई कोई साधारण घटना को भी इतना विस्तृत रूप दे दिया जायेगा। मानों सारा हिन्दू समाज दलितों का सबसे बड़ा शत्रु  है।
हम दो उदहारणों के माध्यम से इस खेल को समझेंगे। पूर्वोत्तर राज्यों में ईसाई चर्च का बोलबाला है। रियांग आदिवासी त्रिपुरा राज्य में पीढ़ियों से रहते आये है। वे हिन्दू वैष्णव मान्यता को मानने वाले है। ईसाईयों ने भरपूर जोर लगाया परंतु उन्होंने ईसाई बनने से इनकार कर दिया।
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चर्च ने अपना असली चेहरा दिखाते हुए रियांग आदिवासियों की बस्तियों पर अपने ईसाई गुंडों से हमला करना आरम्भ कर दिया। वे उनके घर जला देते, उनकी लड़कियों से बलात्कार करते, उनकी फसल बर्बाद कर देते। अंत में कई रियांग ईसाई बन गए, कई त्रिपुरा छोड़कर आसाम में निर्वासित जीवन जीने लग गए।
पाठकों ने कभी चर्च के इस अत्याचार के विषय में नहीं सुना होगा। क्योंकि सभी मानवाधिकार संगठन, NGOs, प्रिंट मीडिया, अंतराष्ट्रीय संस्थाएं ईसाईयों के द्वारा प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से संचालित हैं। इसके ठीक उल्ट गुजरात के ऊना में कुछ दलितों को गोहत्या के आरोप में हुई पिटाई को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐसे उठाया गया जैसे इससे बड़ा अत्याचार तो दलितों के साथ कभी हुआ ही नहीं है।
रियांग आदिवासी भी दलित हैं। उनके ऊपर जो अत्याचार हुआ उसका शब्दों में बखान करना असंभव है। मगर गुजरात की घटना का राजनीतीकरण कर उसे उछाला गया।
जिससे दलितों के मन में हिन्दू समाज के लिए द्वेष भरे। इस प्रकार से चर्च अपने सभी काले कारनामों पर सदा पर्दा डालता है और अन्यों की छोटी छोटी घटनाओं को सुनियोजित तरीके से मीडिया के द्वारा प्रयोग कर अपना ईसाईकरण का कार्यक्रम चलाता है। इसके लिए विदेशों से चर्च को अरबों रूपया हर वर्ष मिलता है
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इस चित्र के दो अर्थ निकलते हैं... पहला है "धूर्तता" और दूसरा है "वैचारिक दरिद्रता"... -- धूर्तता इसलिए कि अनपढ़, आदिवासी-ग्रामीणों को इस "माहौल" से भरमाया जाता है, और उन्हें कन्वर्ट कर लिया जाता है...

मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

ईसा मसीह की "पूजा" में, फल-फूल-नारियल-पान-सुपारी-दीपस्तंभ... यानी वह सब कुछ, जो हिन्दू देवी-देवताओं के पूजन में उपयोग किया जाता है... केवल दीवार का चित्र और टेबल पर रखा ग्रन्थ बदल गया है, बाकी सब कुछ वही है जो हजारों वर्ष से भारत के घर-घर में परंपरा है.
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इस चित्र के दो अर्थ निकलते हैं... पहला है "धूर्तता" और दूसरा है "वैचारिक दरिद्रता"... -- धूर्तता इसलिए कि अनपढ़, आदिवासी-ग्रामीणों को इस "माहौल" से भरमाया जाता है, और उन्हें कन्वर्ट कर लिया जाता है...

और वैचारिक दरिद्रता इसलिए, कि चर्च के पास "खुद का" ऐसा कुछ भी ठोस, आकर्षक व आध्यात्मिक नहीं है कि वह "अपनी संस्कृति, अपनी परंपरा" के बल पर किसी को लुभा सके... उन्हें सनातन धर्म से "उधार" लेकर ही काम चलाना पड़ता है.
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भारत के हिन्दुओ, अब तो इकट्ठा हो जाओ!

शनिवार, 21 अप्रैल 2018

भारत के हिन्दुओ, अब तो इकट्ठा हो जाओ!

 — 18.04.2018 16:48 IndiaFacts

इन तस्वीरों को देखो। ग़ौर से देखो कि किस तरह से एक सामाजिक अपराध के आरोपियों के तथाकथित कृत्य का दोषी पूरा हिन्दू समाज बना दिया गया है। इसमें अपने आराध्य को खोजो और ये सवाल खुद से पूछो कि इसमें राम, शिव, सीता और भगवा झंडे के इस तरह के प्रस्तुतीकरण की क्या ज़रूरत है। ये सवाल औरों से पूछो, शेयर करो और जानने की कोशिश करो कि आखिर अपराधी के अपराध की सज़ा पूरे धर्म को सवालों के दायरे में रखकर, घृणित चित्रण करते हुए किस मक़सद से की जा रही है।

आजकल एंटी-हिन्दू प्रोपेगेंडा फ़ैशनेबल से वायरल हो गया है। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की बात करते हुए सारी पार्टियाँ एक तरफ होकर खुल्लमखुल्ला आह्वान करती हैं कि दलित हो तो हमें वोट तो, मुसलमान हो तो हमें वोट दो, लेकिन साम्प्रदायिक कौन सी पार्टी हुई? भाजपा।

जी हाँ, और अब ये लोग ज़्यादा दिन तक मूर्ख नहीं बना पाएँगे क्योंकि नैरेटिव बनाने वाले अभी तक पुराने ही ढर्रे से सोच रहे हैं, जब वो विभिन्न माध्यमों से 'एकतरफ़ा संवाद' कर दिया करते थे और लोगों को दूसरा पक्ष हमेशा गौण नज़र आता था। वो इसलिए होता था कि इन कैंसरकारक बुद्धिजीवियों की पकड़ बहुत गहरी हुआ करती थी हर जगह।

यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर से लेकर, मीडिया में कॉलम लिखते विचारक, बॉलीवुड के मुखर लोग और वेबसाइटों पर ज्ञान देते वामपंथी चिरकुट, ये सब के सब ज़हर घोलते रहे समाज में।

लेकिन सोशल मीडिया ने इनको तय तरीक़ों पर हमला बोल दिया है। अब हमला और वैचारिक युद्ध दोतरफ़ा है। उनके पोस्ट ट्रूथ को इनका पोस्ट ट्रूथ काटने को तैयार है। अब प्रवचन नहीं चलेगा कि देश को बाँट रहे हैं भाजपाई और संघी। क्योंकि प्रवचन सुनने वालों ने सवाल करना शुरु कर दिया है कि 'कैसे?' इसका जवाब इनके पास नहीं है क्योंकि इन्होंने सोचा नहीं था कि नीचे ज़मीन पर आधी ईंट पर बैठा आदमी सवाल पूछ सकता है।

जो जवाब इनके पास हैं, वो वही हैं जो वास्तविकता से परे, रटे-रटाए, प्रोपेगेंडा मशीनरी से निकलकर इनके पास पहुँचते हैं। वही पुराना 'हिन्दुत्व अजेंडा' घातक है देश के लिए जैसे कि पहले ये अजेंडा चला था कभी और उसके परिणाम भयावह आए! जो अजेंडा तुमने चलाया उससे तो देश लगातार बँटता जा रहा है, और उसका भी ठीकरा भाजपा के ही सर?

बलात्कारों में जाति, धर्म ढूँढना, एफआईआर को सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट मान लेना, रैली के मक़सद को गलत बताकर झूठ फैलाना आदि इसी तंत्र का हिस्सा है। लेकिन लोग अब कठुआ और उन्नाव से ख़बरें मँगवा सकते हैं और ये सवाल उठा सकते हैं कि गौरी लंकेश के मरने के आधे घंटे में किस जाँच के बल पर ये तय हो जाता है कि हत्या दक्षिणपंथियों ने की? हर बार ये होता है और चुनावों के समय इसे हवा देकर एक पार्टी के ख़िलाफ़ हवा बनाई जाती है।

तुम हिन्दुओं को आतंकवादी कहते रहो, वो एकजुट होता रहेगा। अगर नोटबंदी, जीएसटी, और तुम्हारे गिनाए तमाम असफलताओं के बावजूद भाजपा लगातार सत्ता पा रही है तो ये समझना चाहिए कि इसमें मदद तुम ही तो कर रहे हो। तुम कठुआ वाली घटना में हिन्दुओं के भगवानों को ज़लील करोगे तो क्या एक सामान्य हिन्दू भी इस हेट-कैम्पेन को नहीं समझेगा? क्या वो अपने स्तर पर ये विवेचना नहीं करेगा कि ये हिन्दुओं को तोड़ने की साज़िश है? क्या वो ये नहीं सवाल करेगा कि आठ आरोपियों के पाप का भागी वो, उसका धर्म और आराध्य क्यों बनाए जा रहे हैं?

फिर वही होगा कि जिसे राजनीति से ज्यादा लगाव नहीं था, वो भी दस लोगों से बात करते हुए अघोषित काडर बनकर भाजपा के पक्ष में वोट गिरवाएगा। और वो भाजपा के पक्ष में इसलिए क्योंकि लोगों को लगता है वही एक पार्टी है जो हिन्दुओं के हितों का ख़्याल रखती है। इसीलिए अब राहुल गाँधी को भी मंदिर जाना पड़ रहा है और वामपंथी भी भारत माता की जय बोलने लगे हैं।

मैं चाहूँगा कि आप सब अपने स्तर से अब इस घृणा के अजेंडे को गम्भीरता से लेना शुरु कीजिए। अब ज़रूरी है कि इस देश पर वो लोग ही सत्ता संभालें जो हिन्दुओं के हितों को भी देखेंगे, न कि सिर्फ़ अल्पसंख्यक तुष्टीकरण में लगे रहेंगे। ज़रूरत है कि ऐसे कानून बनें जहाँ हिन्दुओं के देवी-देवता को किसी भी तरीक़े से बुरी तरह से दिखाए जाने पर वही सजा हो जो मुसलमानों और ईसाइयों के आराध्यों की निंदा के लिए है।

अब ये मशीनरी फ़्रिंज ग्रुप नहीं है, ये एक व्यवस्थित तरीक़े से काम करती हुई डिजिटल सेना है। इसको काटने के लिए हर स्तर से इनके ऊपर हमला बोलना होगा। उनके झूठ और प्रपंच को काटने के लिए आप भी सत्य और तथ्य से बातें कीजिए, उनकी धूर्तता को दबाने के लिए आप उनको एक्सपोज़ कीजिए। वो एक जगह फेक न्यूज पर रोते दिखें, और दूसरी जगह फैलाते दिखें, तो उनके दोगलेपन को लोगों तक पहुँचाइए। वो आर्टिकल और कॉलम के ज़रिए संवेदनशील होने का ढोंग करते हुए हेट कैम्पेन चलाएँ, तो आप उनकी संवेदनहीनता को उनकी मंशा बताकर उनको नग्न कीजिए।

आपके पास भी वही टूल्स और सूचनाओं का एक्सेस है जो उनके पास है। आज तक हम और आप बैठकर सुनते रहे, इग्नोर करते रहे, अब समय आ गया है कि इन्हें इनकी ही भाषा में, दुगुने तेज़ी और ज़ोर के साथ जवाब दिया जाए। अब ये एक अघोषित युद्ध है, और मैं अपने धर्म को त्रिशूल में लिपटे कॉन्डोम और लिंग में घुसे भगवा झंडे के स्तर तक गिरता नहीं देखना चाहता।

The article has been republished from author's blog with permission.

Featured Image: Kashmiri Muslim women throwing stone at Indian Security Forces(The Print)

Disclaimer: The opinions expressed within this article are the personal opinions of the author. IndiaFacts does not assume any responsibility or liability for the accuracy, completeness, suitability, or validity of any information in this article.
ajeet.bharti@gmail.com'

Author is an avid blogger who prefers to write on social and political issues. He is the author of best selling Hindi 'bachelor satire' Bakar Puran. Follow him on Twitter @ajeetbharti

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चेन्नई में हुए ईसाई मिशनरी के राक्षसी कृत्य पर चुप क्योँ है “मीडिया” ?

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

चेन्नई में हुए ईसाई मिशनरी के राक्षसी कृत्य पर चुप क्योँ है "मीडिया" ?

 — 28.02.2018 17:06 क्रांतिदूत

चेन्नई के निकट ताम्बरम में 21 व 22 फरवरी को एक दिल दहला देने वाली खबर सामने आई ! यह राक्षसी कृत्य कारित किया गया है "फादर जोसेफ" के द्वारा संचालित युसूफ करूणयी इललाम-इललाम अर्थात सेंट जोसेफ़ होस्पिसस मतलब ओल्डएज होम यानि वृद्धाश्रम में ! इंटेलिजेंस के द्वारा छापा मारने के बाद यहाँ से बड़े बड़े बक्सों के अन्दर से मांस के लोथड़े रुपी लाशें बरामद हुई और पता नहीं कि इससे पहले न जाने कितने लोथड़े मिटटी में मिल गए होंगे परन्तु एक फ़िल्मी कलाकार के निधन को प्रमुख खबर बनाने में जुटी भारतीय मीडिया के पास इस खबर पर प्रकाश डालने तक का समय नहीं है ! अगर यही बर्बर कार्य किसी हिन्दू संस्था या संगठन के द्वारा किया गया होता तो पूरे देश में आग लग चुकी होती, बंद के आयोजन प्रारंभ हो गए होते, देश के प्रधानमंत्री निशाने पर होते परन्तु अफ़सोस यह कृत्य एक ईसाई मिशनरी के द्वारा कारित किया गया है अतः मानवाधिकार संगठनों ने भी अपने आँख,कान और मुंह बंद किये हुए है ! 

किसी भी एनजीओ का उद्देश्य रोगियों, पीड़ितों और जरूरतमंदों की सेवा तथा जनता को विभिन्न मुद्दों पर जागरूक करना होता है परन्तु सेंट जोसेफ़ होस्पिसस में सेवा के नाम पर हैवानियत का घिनौना रूप सामने आया है ! तमिलनाडु के 'सेंट जोसेफ हॉस्पिंस' नामक एक गैर-सरकारी संगठन के आश्रम में बीमार मरीज़ों को मारकर उनकी हड्डियों की कटाई की जाती है ! कुछ रिपोर्ट ने यह भी आरोप लगाया है कि यह एनजीओ अपने मरीज़ों के अंगों की कटाई कर उसे अन्य देशों को बेच रहा है ! 'होम फॉर डाइंग डेस्टिटयूट' नामक यह एनजीओ आरवी थॉमस द्वारा वर्ष 2011 में स्थापित किया गया था ! यह ईसाई पादरी, डिंडीगुल और पालेश्वरम में भी इसी प्रकार के अन्य दो क्रिश्चियन हॉस्पिंस चला रहा है ! 

यह क्रिश्चियन हॉस्पिंस, आश्रम की ही तरह होता है, जो निराश्रित और बीमार लोगों की सुश्रुषा करता है ! एक तमिल न्यूज़ चैनल ज़मीनी तौर पर जांच-पड़ताल के बाद इस एनजीओ की घिनौनी सच्चाई सबके सामने लाया है ! एनजीओ की कथित गैरकानूनी गतिविधियां तब उजागर हुईं, जब ग्रामीणों ने एक वैन का रास्ता रॊककर हंगामा कर दिया, जो अस्पताल से मृतकों के शवों को ले जा रही थी ! वैन के अंदर से एक बूढ़ी महिला के रोने की आवाज़ आ रही थी, वह 'बचाओ-बचाओ' की आवाज़ लगा रही थी ! बूढी महिलाओं की पुकार पर सड़क पर गाड़ी को रोका गया ! उस गाड़ी से दो वृद्ध जनों को बचाया गया ! अन्य एक बुज़ुर्ग पुरुष, जो डिंडिगुल के निवासी थे, उनको भी वैन के अंदर से बाहर निकाला गया ! फिर इसके बाद इस ओल्डएज होम पर छापा पड़ा जहाँ इंटेलिजेंस वालों के होश उड़ गए ! यहाँ लाशों के रैक बने हुए थे जिनमे बड़े बड़े बोक्सों में मांस के लोथड़े रुपी लाशें रखी हुई थी ! इसके बाद आश्रम पर इसमें रहने वाले वृद्ध लोगों कि पिछले कुछ माह में मौते होने एवं उनके अंगों और अस्थियों के अवैध सौदे की जानकारी आना प्रारंभ हुई परन्तु प्रारंभ में इस मामले को दबाने का प्रयास किया गया इस बात को लेकर कुछ राजनैतिक दलों ने स्थानीय लोगों के विरोध को पुलिस के द्वारा दबाये जाने की निंदा की ! जिसके बाद जिला कलेक्टर पी. पोनय्या के निर्दश पर आश्रम की छानबीन की गयी और यहाँ रहने वाले बुजुर्गों को अन्यत्र स्थान पर ठहराए जाने को कहा गया ! 

इसी दौरान 'एफसीआरए एनालिस्ट' नामक एक ट्विटर यूजर ने इस एनजीओ को मिलने वाली आर्थिक सहायता के सूत्र का भी पता लगाया है ! उसके अनुसार 'लाइट फॉर द ब्लाइंड – इंडिया' नामक एक विदेशी संस्था इस एनजीओ को वित्तीय सहायता दे रही है !

noreply@blogger.com (क्रांति दूत)

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एकलव्य को लेकर भीमटो की थ्योरी में न फंसे हिन्दू, एकलव्य का दलित, ब्राह्मण से कुछ लेना देना नहीं

रविवार, 15 अप्रैल 2018

एकलव्य को लेकर भीमटो की थ्योरी में न फंसे हिन्दू, एकलव्य का दलित, ब्राह्मण से कुछ लेना देना नहीं




भीमटे एक प्योर दोगला ब्रीड है, इस ब्रीड में इस्लामी और इसाई डीएनए दोनों शामिल है, ये भीमटे बड़े उच्च क्वालिटी के दोगले होते है, कहते है की रामायण और महाभारत काल्पनिक है, साथ ही ये भी कहते है की एकलव्य दलित था इसलिए उसके साथ द्रोणाचार्य ने अन्याय किया, भैया पहले तय तो कर लो की रामायण महाभारत को तुम मानते भी हो या नहीं, दोनों चीज एक साथ कैसे हो सकता है, खैर 

भीमटे महाभारत काल के एकलव्य को लेकर हमेशा झूठ फैलाते है, पहले आपको साफ़ कर दें की हिन्दू धर्म में "दलित" जैसा कुछ भी नहीं है, दलित कांसेप्ट तो 19वी सदी में बनाया गया, जबकि हिन्दू धर्म हजारों साल पुराना है, और एकलव्य महाभारत का पात्र है, हिन्दू धर्म में है, उसका दलित से कुछ लेना देना नहीं, खैर 

फेसबुकिया भीमवादियों द्वारा अक्सर एक झूठ फैलाया जाता है कि गुरु द्रोण ने एकलव्य का अंगूठा इसलिये मांग लिया था कि क्योंकि वो एक शूद्र था । जबकि ऐसा बिल्क नही है आज मैं आप सबको एकलव्य की असली कहानी बता रहा हूँ जो शायद आपने नही सुनी होगी क्योंकि इस कहानी को अक्सर कथावाचकों द्वारा न तो सुनाया जाता है और न ही इस पर कोई लिखता है । खैर छोड़िए हम आपको बताते हैं आली कहानी । 
महाभारत काल मेँ प्रयाग (इलाहाबाद) के तटवर्ती प्रदेश मेँ सुदूर तक फैला श्रृंगवेरपुर राज्य एकलव्य के पिता निषादराज हिरण्यधनु का था। गंगा के तट पर अवस्थित श्रृंगवेरपुर उसकी सुदृढ़ राजधानी थी। उस समय श्रृंगवेरपुर राज्य की शक्ति मगध, हस्तिनापुर, मथुरा, चेदि और चन्देरी आदि बड़े राज्योँ के समकक्ष थी। निषाद हिरण्यधनु और उनके सेनापति गिरिबीर की वीरता विख्यात थी।

निषादराज हिरण्यधनु और रानी सुलेखा के स्नेहांचल से जनता सुखी व सम्पन्न थी। राजा राज्य का संचालन आमात्य (मंत्रि) परिषद की सहायता से करता था। निषादराज हिरण्यधनु को रानी सुलेखा द्वारा एक पुत्र प्राप्त हुआ जिसका नाम "अभिद्युम्न" रखा गया। प्राय: लोग उसे "अभय" नाम से बुलाते थे। पाँच वर्ष की आयु मेँ अभिद्युम्न की शिक्षा की व्यवस्था कुलीय गुरूकुल मेँ की गई। गुरुकुल में ही गुरुओं ने इसकी सीखने की क्षमता को देखकर इसको नया नाम दिया एकलव्य ।

एकलव्य के युवा होने पर उसका विवाह हिरण्यधनु ने अपने एक निषाद मित्र की कन्या सुणीता से करा दिया। एकलव्य धनुर्विद्या की उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहता था। उस समय धनुर्विद्या मेँ गुरू द्रोण की ख्याति थी। एकलव्य ने अपने पिता से गुरु द्रोण के पाया धनुर्विद्या सीखने की बात कही तो पिता तो कहा गुरु द्रोण शत्रु राज्य के राजगुरु हैं और उन्होंने भीष्म को वचन भी दिया हुआ है कि वो हस्तिनापुर के राजकुमारों के सिवा किसी को शिक्षा नही देंगे । वो एक ब्राह्मण हैं इसलिए अपने वचन से नही हटेंगे वो तुम्हे शिक्षा नही देंगे । लेकिन एकलव्य जिद करके हठपूर्वक घर से गुरु द्रोण से शिक्षा प्राप्त करने निकल पड़ा । 

गुरु द्रोण के आश्रम आकर उसने स्वयं का परिचय देकर और अपनी अभिमान पूर्वक अपनी योग्यता बताकर गुरु द्रोण से शिक्षा देने की बात कही । जिसे गुरु द्रोण ने वचन बंधे होने की बात कहकर मना दिया । बार बार कहने पर भी गुरु द्रोण नही माने तो उसने आश्रम के पास छिपकर हस्तिनापुर के राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते गुरु द्रोण को देखते हुए धनुर्विद्या सीखता रहा । 

और फिर एक दिन गुरु द्रोण जंगल भ्रमण को अपने शिष्यों के साथ निकले । एकलव्य भी पीछे पीछे उनके साथ गया । गुरु द्रोण के साथ गए कुत्ते ने उसे देख लिया और वो भौकने लगा । कुत्ते को चुप कराने के लिए एकलव्य ने कुत्ते का मुंह बाणों से बंद कर दिया । ये देखकर गुरु द्रोण स्तब्ध रह गए क्योंकि उस समय मे ऐसा कोई दूसरा गुरु था ही नही जो ऐसी शिक्षा दे सकता हो । 

गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसके गुरु का नाम पूछा तो उसने उन्हें ही अपना गुरु बताया और साथ ही ये झूठ भी बोला कि उसने गुरु द्रोण की प्रतिमा बनाकर ये धनुर्विद्या सीखी । गुरु द्रोण समझ गए कि इसने छिपकर सारी धनुर्विद्या सीखी है ।  एकलव्य ने गुरु द्रोण से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया तो द्रोण ने उससे छलपुर्वक सीखी गई विद्या को नष्ट करने के लिए उसका अंगूठा ही मांग लिया जिसे उसने काटकर दे दिया । इससे ही गुरु ने प्रसन्न होकर उसे बगैर अंगूठे के ही धनुष बाण चलाने की विद्या का दान दिया इस शर्त पर कि इसका प्रयोग कभी भी वो हस्तिनापुर पर नही करेगा । 

अपने पिता की मृत्यु के बाद एकलव्य शाशक बना जिसने अपने राज्य का खूब प्रसार किया । आसपास के सभी छोटे राज्यों को अपने मे मिला लिया । बचन बद्ध होने के कारण हस्तिनापुर पर कभी आक्रमण नही कर पाया लेकिन विष्णु पुराण और हरिवंश पुराण में उल्लिखित है कि निषाद वंश का राजा बनने के बाद एकलव्य ने जरासंध की सेना की तरफ से मथुरा पर आक्रमण कर यादव सेना का लगभग सफाया कर दिया था। यादव वंश में हाहाकर मचने के बाद जब कृष्ण ने दाहिने हाथ में महज चार अंगुलियों के सहारे धनुष बाण चलाते हुए एकलव्य को देखा तो उन्हें इस दृश्य पर विश्वास ही नहीं हुआ। और उन्हें स्वयं युद्धभूमि में आकर उसके साथ युद्ध करना पड़ा जिसमे वो मारा गया ।

उसकी मृत्यु के बाद एकलव्य का पुत्र केतुमान सिंहासन पर बैठता है और वह कौरवों की सेना की ओर से पांडवों के खिलाफ लड़ता है। महाभारत युद्ध में वह भीम के हाथ से मारा जाता है । कुछ कथाएं और सामने आती हैं जिनमे कहा गया है कि एकलव्य निषदराज का दत्तक पुत्र था असल में वो श्रीकृष्ण के यदुवंश से था जिसे किसी ज्योतिषीय भविष्यवाणी के अनुसार निषदराज को दे दिया गया था ।

एकलव्य का युद्ध करते हुए मारा जाना और उसके पुत्र का महाभारत के युद्ध में भाग लेना ये सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शूद्रों को भी बराबर का अधिकार था । वामपंथियों ने गलत तथ्य फैलाकर हिन्दू धर्म को तोड़ने का कुचक्र रचा है ।  ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र सभी से निवेदन है तथ्यों की सही से जांच करें । हिंदुत्व के चार स्तम्भ में से एक भी कमजोर हुआ तो हिंदुत्व कमजोर होगा फिलहाल निशाना चतुर्थ स्तम्भ को बनाया जा रहा । सचेत रहें सतर्क रहें । 
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ईसाई धर्म मान्यताओं की सच्चाई जानोगे तो आपकी खुल जाएगी आँखे

रविवार, 4 मार्च 2018

ईसाई धर्म मान्यताओं की सच्चाई जानोगे तो आपकी खुल जाएगी आँखे

If you know the truth of Christian beliefs, you will be open eyes

ईसाई धर्म ऊपर से देखने पर एक सभ्य, सुशिक्षित, शांतिप्रिय समाज लगता हैं।  जिसका उद्देश्य ईसा मसीह की शिक्षाओं का प्रचार प्रसार एवं निर्धनों व दीनों की सेवा-सहायता करना हैं। इस मान्यता का कारण ईसाई समाज द्वारा बनाई गई छवि है।

 यह कटु सत्य है कि ईसाई मिशनरियां विश्व के जिस किसी देश में गई, उस देश के निवासियों को उनके मूल धर्म में खामियां बताकर अपने धर्म मे जोड़ने की कोशिश करती रही ।  इस सुनियोजित नीति के बल पर वे अपने आपको श्रेष्ठ, सभ्य तथा दूसरों को निकृष्ट एवं असभ्य सिद्ध करते रहे हैं। इस लेख के माध्यम से हम ईसाई मत की तीन सबसे प्रसिद्ध मान्यताओं की समीक्षा करेंगे, जिससे पाठकों के भ्रम का निवारण हो जाये।

1. प्रार्थना से चंगाई

2. पापों का क्षमा होना

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना

1. प्रार्थना से चंगाई [i]

ईसाई समाज में ईसा मसीह अथवा चर्च द्वारा घोषित किसी भी संत की प्रार्थना करने से बिमारियों का ठीक होने की मान्यता पर अत्यधिक बल दिया जाता है । आप किसी भी ईसाई पत्रिका, किसी भी गिरिजाघर की दीवारों आदि में जाकर ऐसे विवरण (Testimonials) देख सकते हैं। आपको दिखाया जायेगा कि एक गरीब आदमी था। जो वर्षों से किसी लाईलाज बीमारी से पीड़ित था। बहुत उपचार करवाया मगर बीमारी ठीक नहीं हुई। अंत में प्रभु ईशु अथवा मरियम अथवा किसी ईसाई संत की प्रार्थना से चमत्कार हुआ और उसकी यह बीमारी सदा सदा के लिए ठीक हो गई। सबसे अधिक निर्धनों और गैर ईसाईयों को प्रार्थना से चंगा (ठीक) होता दिखाया जाता हैं। यह चमत्कार की दुकान सदा चलती रहे इसलिए समय समय पर अनेक ईसाईयों को मृत्यु उपरांत संत घोषित किया जाता हैं। हाल ही में भारत से मदर टेरेसा और सिस्टर अलफोंसो को संत घोषित किया गया हैं और विदेश में दिवंगत पोप जॉन पॉल को संत घोषित किया गया है। यह संत बनाने की प्रक्रिया भी सुनियोजीत होती हैं। पहले किसी गरीब व्यक्ति का चयन किया जाता हैं जिसके पास इलाज करवाने के लिए पैसे नहीं होते।

प्रार्थना से चंगाई में विश्वास रखने वाली मदर टेरेसा खुद विदेश जाकर तीन बार आँखों एवं दिल की शल्य चिकित्सा करवा चुकी थी ।[ii]

संभवत हिन्दुओं को प्रार्थना का सन्देश देने वाली मदर टेरेसा को क्या उनको प्रभु ईसा मसीह अथवा अन्य ईसाई संतो की प्रार्थना द्वारा चंगा होने में विश्वास नहीं था जो वे शल्य चिकित्सा करवाने विदेश जाती थी?

सिस्टर अलफोंसो केरल की रहने वाली थी। अपने जीवन के तीन दशकों में से करीब 20 वर्ष तक अनेक रोगों से ग्रस्त रही थी ।[iii]

केरल एवं दक्षिण भारत में निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाने की प्रक्रिया को गति देने के लिए संभवत उन्हें भी संत का दर्जा दे दिया गया और यह प्रचारित कर दिया गया कि उनकी प्रार्थना से भी चंगाई हो जाती हैं।

दिवंगत पोप जॉन पॉल स्वयं पार्किन्सन रोग से पीड़ित थे और चलने फिरने से भी असमर्थ थे। यहाँ तक कि उन्होंने अपना पद अपनी बीमारी के चलते छोड़ा था । [iv]

कोस्टा रिका की एक महिला के मस्तिष्क की व्याधि जिसका ईलाज करने से चिकित्सकों ने मना कर दिया था। वह पोप जॉन पॉल के चमत्कार से ठीक हो गई। इस चमत्कार के चलते उन्हें भी चर्च द्वारा संत का दर्ज दिया गया हैं।

पाठक देखेगे कि तीनों के मध्य एक समानता थी। जीवन भर ये तीनों अनेक बिमारियों से पीड़ित रहे थे। मरने के बाद अन्यों की बीमारियां ठीक करने का चमत्कार करने लगे। अपने मंच से कैंसर, एड्स जैसे रोगों को ठीक करने का दावा करने वाले बैनी हिन्न (Benny Hinn) नामक प्रसिद्ध ईसाई प्रचारक हाल ही में अपने दिल की बीमारी के चलते ईलाज के लिए अस्पताल में भर्ती हुए थे । [v]

वह atrial fibrillation नामक दिल के रोग से पिछले 20 वर्षों से पीड़ित है। तर्क और विज्ञान की कसौटी पर प्रार्थना से चंगाई का कोई अस्तित्व नहीं हैं। अपने आपको आधुनिक एवं सभ्य दिखाने वाला ईसाई समाज प्रार्थना से चंगाई जैसी रूढ़िवादी एवं अवैज्ञानिक सोच में विश्वास रखता हैं। यह केवल मात्र अंधविश्वास नहीं अपितु एक षड़यंत्र है। गरीब गैर ईसाईयों को प्रभावित कर उनका धर्म परिवर्तन करने की सुनियोजित साजिश हैं।

2. पापों का क्षमा होना

ईसाई मत की दूसरी सबसे प्रसिद्ध मान्यता है पापों का क्षमा होना। इस मान्यता के अनुसार कोई भी व्यक्ति कितना भी बड़ा पापी हो। उसने जीवन में कितने भी पाप किये हो। अगर वो प्रभु ईशु मसीह की शरण में आता है तो ईशु उसके सम्पूर्ण पापों को क्षमा कर देते हैं। यह मान्यता व्यवहारिकता,तर्क और सत्यता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। व्यवहारिक रूप से आप देखेगे कि संसार में सभी ईसाई देशों में किसी भी अपराध के लिए दंड व्यवस्था का प्रावधान हैं। क्यों? कोई ईसाई मत में विश्वास रखने वाला अपराधी अपराध करे तो उसे चर्च ले जाकर उसके पाप स्वीकार (confess) करवा दिए जाये। स्वीकार करने पर उसे छोड़ दिया जाये। इसका क्या परिणाम निकलेगा? अगले दिन वही अपराधी और बड़ा अपराध करेगा क्यूंकि उसे मालूम है कि उसके सभी पाप क्षमा हो जायेगे। अगर समाज में पापों को इस प्रकार से क्षमा करने लग जाये तो उसका अंतिम परिणाम क्या होगा? जरा विचार करें ।

महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थ प्रकाश [vi] में ईश्वर द्वारा अपने भक्तों के पाप क्षमा होने पर ज्ञानवर्धक एवं तर्कपूर्ण उत्तर दिया हैं। स्वामी जी लिखते हैं । - "नहीं, ईश्वर किसी के पाप क्षमा नहीं करता। क्योंकि जो ईश्वर पाप क्षमा करे तो उसका न्याय नष्ट हो जाये और सब मनुष्य महापापी हो जायें। इसलिए कि क्षमा की बात सुन कर ही पाप करने वालों को पाप करने में निभर्यता और उत्साह हो जाये। जैसे राजा यदि अपराधियों के अपराध को क्षमा कर दे तो वे उत्साहपूर्वक अधिक अधिक बड़े-बड़े पाप करें। क्योंकि राजा अपना अपराध क्षमा कर देगा और उनको भी भरोसा हो जायेगा कि राजा से हम हाथ जोड़ने आदि चेष्टा कर अपने अपराध छुड़ा लेंगे और जो अपराध नहीं करते, वे भी अपराध करने में न डरकर पाप करने में प्रवृत्त हो जायेंगे। इसलिए सब कर्मों का फल यथावत् देना ही ईश्वर का काम है, क्षमा करना नहीं"

वैदिक विचारधारा में ईश्वर को न्यायकारी एवं दयालु बताया गया हैं। परमेश्वर न्यायकारी है,क्यूंकि ईश्वर जीव के कर्मों के अनुपात से ही उनका फल देता है कम या ज्यादा नहीं। परमेश्वर दयालु है, क्यूंकि कर्मों का फल देने की व्यवस्था इस प्रकार की है जिससे जीव का हित हो सके। शुभ कर्मों का अच्छा फल देने में भी जीव का कल्याण है और अशुभ कर्मों का दंड देने में भी जीव का ही कल्याण है। दया का अर्थ है जीव का हित चिंतन और न्याय का अर्थ है, उस हितचिंतन की ऐसी व्यवस्था करना कि उसमें तनिक भी न्यूनता या अधिकता न हो।

ईसाई मत में प्रचलित पापों को क्षमा करना ईश्वर के न्यायप्रियता और दयालुता गुण के विपरीत हैं। अव्यवहारिक एवं असंगत होने के कारण अन्धविश्वास मात्र हैं।

3. गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित करना

ईसाई मत को मानने वालो में गैर ईसाईयों को ईसाई मत में धर्मान्तरित कर शामिल करने की सदा चेष्टा बनी रहती हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता हैं कि जैसे वही ईसाई सच्चा ईसाई तभी माना जायेगा जो गैर ईसाईयों को ईसाई नहीं बना लेगा। ऐसा प्रतीत होता है कि ईसाईयों में आचरण और पवित्र व्यवहार से अधिक धर्मान्तरण महत्वपूर्ण हो चला हैं। धर्मांतरण के लिए ईसाई समाज हिंसा करने से भी पीछे नहीं हटता। अपनी बात को मैं उदहारण देकर सिद्ध करना चाहता हूँ। ईसाई प्रभुत्व वाले पूर्वोत्तर के राज्य मिजोरम से वैष्णव हिन्दू रीति को मानने वाली रियांग जनजाति को धर्मान्तरण कर ईसाई न बनने पर चर्च द्वारा समर्थित असामाजिक लोगों ने हिंसा द्वारा राज्य से निकाल दिया[vii]। 

हिंसा के चलते रियांग लोग दूसरे राज्यों में शरणार्थी के रूप में रहने को बाधित हैं। सरकार द्वारा बनाई गई नियोगी कमेटी के ईसाईयों द्वारा धर्मांतरण के लिए अपनाये गए प्रावधानों को पढ़कर धर्मान्तरण के इस कुचक्र का पता चलता हैं[viii]।

 चर्च समर्थित धर्मान्तरण एक ऐसा कार्य हैं जिससे देश की अखंडता और एकता को बाधा पहुँचती हैं।

इसीलिए हमारे देश के संभवत शायद ही कोई चिंतक ऐसे हुए हो जिन्होंने प्रलोभन द्वारा धर्मान्तरण करने की निंदा न की हो। महान चिंतक एवं समाज सुधारक स्वामी दयानंद का एक ईसाई पादरी से शास्त्रार्थ हो रहा था। स्वामी जी ने पादरी से कहा कि हिन्दुओं का धर्मांतरण करने के तीन तरीके है। पहला जैसा मुसलमानों के राज में गर्दन पर तलवार रखकर जोर जबरदस्ती से बनाया जाता था। दूसरा बाढ़, भूकम्प, प्लेग आदि प्राकृतिक आपदा जिसमें हज़ारों लोग निराश्रित होकर ईसाईयों द्वारा संचालित अनाथाश्रम एवं विधवाश्रम आदि में लोभ-प्रलोभन के चलते भर्ती हो जाते थे और इस कारण से आप लोग प्राकृतिक आपदाओं के देश पर बार बार आने की अपने ईश्वर से प्रार्थना करते है और तीसरा बाइबिल की शिक्षाओं के जोर शोर से प्रचार-प्रसार करके। मेरे विचार से इन तीनों में सबसे उचित अंतिम तरीका मानता हूँ। स्वामी दयानंद की स्पष्टवादिता सुनकर पादरी के मुख से कोई शब्द न निकला। स्वामी जी ने कुछ ही पंक्तियों में धर्मान्तरण के पीछे की विकृत मानसिकता को उजागर कर दिया[ix]।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ईसाई धर्मान्तरण के सबसे बड़े आलोचको में से एक थे। अपनी आत्मकथा में महात्मा गांधी लिखते है "उन दिनों ईसाई मिशनरी हाई स्कूल के पास नुक्कड़ पर खड़े हो हिन्दुओं तथा देवी देवताओं पर गलियां उड़ेलते हुए अपने मत का प्रचार करते थे। यह भी सुना है कि एक नया कन्वर्ट (मतांतरित) अपने पूर्वजों के धर्म को, उनके रहन-सहन को तथा उनके गलियां देने लगता है। इन सबसे मुझमें ईसाइयत के प्रति नापसंदगी पैदा हो गई।" इतना ही नहीं गांधी जी से मई, 1935 में एक ईसाई मिशनरी नर्स ने पूछा कि क्या आप मिशनरियों के भारत आगमन पर रोक लगाना चाहते है तो जवाब में गांधी जी ने कहा था,' अगर सत्ता मेरे हाथ में हो और मैं कानून बना सकूं तो मैं धर्मांतरण का यह सारा धंधा ही बंद करा दूँ। मिशनरियों के प्रवेश से उन हिन्दू परिवारों में जहाँ मिशनरी पैठे है, वेशभूषा, रीतिरिवाज एवं खानपान तक में अंतर आ गया है[x]।

समाज सुधारक एवं देशभक्त लाला लाजपत राय द्वारा प्राकृतिक आपदाओं में अनाथ बच्चों एवं विधवा स्त्रियों को मिशनरी द्वारा धर्मान्तरित करने का पुरजोर विरोध किया गया जिसके कारण यह मामला अदालत तक पहुंच गया। ईसाई मिशनरी द्वारा किये गए कोर्ट केस में लाला जी की विजय हुई एवं एक आयोग के माध्यम से लाला जी ने यह प्रस्ताव पास करवाया कि जब तक कोई भी स्थानीय संस्था निराश्रितों को आश्रय देने से मना न कर दे तब तक ईसाई मिशनरी उन्हें अपना नहीं सकती[xi]।

समाज सुधारक डॉ अम्बेडकर को ईसाई समाज द्वारा अनेक प्रलोभन ईसाई मत अपनाने के लिए दिए गए । मगर यह जमीनी हकीकत से परिचित थे कि ईसाई मत ग्रहण कर लेने से भी दलित समाज अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित ही रहेगा। डॉ अम्बेडकर का चिंतन कितना व्यवहारिक था यह आज देखने को मिलता है।''जनवरी 1988 में अपनी वार्षिक बैठक में तमिलनाडु के बिशपों ने इस बात पर ध्यान दिया कि धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जाति के ईसाई परंपरागत अछूत प्रथा से उत्पन्न सामाजिक व शैक्षिक और आर्थिक अति पिछड़ेपन का शिकार बने हुए हैं। फरवरी 1988 में जारी एक भावपूर्ण पत्र में तमिलनाडु के कैथलिक बिशपों ने स्वीकार किया 'जातिगत विभेद और उनके परिणामस्वरूप होने वाला अन्याय और हिंसा ईसाई सामाजिक जीवन और व्यवहार में अब भी जारी है। हम इस स्थिति को जानते हैं और गहरी पीड़ा के साथ इसे स्वीकार करते हैं।' भारतीय चर्च अब यह स्वीकार करता है कि एक करोड़ 90 लाख भारतीय ईसाइयों का लगभग 60 प्रतिशत भाग भेदभावपूर्ण व्यवहार का शिकार है। उसके साथ दूसरे दर्जे के ईसाई जैसा अथवा उससे भी बुरा व्यवहार किया जाता है। दक्षिण में अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों को अपनी बस्तियों तथा गिरिजाघर दोनों जगह अलग रखा जाता है। उनकी 'चेरी' या बस्ती मुख्य बस्ती से कुछ दूरी पर होती है और दूसरों को उपलब्ध नागरिक सुविधओं से वंचित रखी जाती है। चर्च में उन्हें दाहिनी ओर अलग कर दिया जाता है। उपासना (सर्विस) के समय उन्हें पवित्र पाठ पढऩे की अथवा पादरी की सहायता करने की अनुमति नहीं होती। बपतिस्मा, दृढि़करण अथवा विवाह संस्कार के समय उनकी बारी सबसे बाद में आती है। नीची जातियों से ईसाई बनने वालों के विवाह और अंतिम संस्कार के जुलूस मुख्य बस्ती के मार्गों से नहीं गुजर सकते। अनुसूचित जातियों से ईसाई बनने वालों के कब्रिस्तान अलग हैं। उनके मृतकों के लिए गिरजाघर की घंटियां नहीं बजतीं, न ही अंतिम प्रार्थना के लिए पादरी मृतक के घर जाता है। अंतिम संस्कार के लिए शव को गिरजाघर के भीतर नहीं ले जाया जा सकता। स्पष्ट है कि 'उच्च जाति' और 'निम्न जाति' के ईसाइयों के बीच अंतर्विवाह नहीं होते और अंतर्भोज भी नगण्य हैं। उनके बीच झड़पें आम हैं। नीची जाति के ईसाई अपनी स्थिति सुधारने के लिए संघर्ष छेड़ रहे हैं, गिरजाघर अनुकूल प्रतिक्रिया भी कर रहा है लेकिन अब तक कोई सार्थक बदलाव नहीं आया है। ऊंची जाति के ईसाइयों में भी जातिगत मूल याद किए जाते हैं और प्रछन्न रूप से ही सही लेकिन सामाजिक संबंधोंं में उनका रंग दिखाई देता है[xii]।

महान विचारक वीर सावरकर धर्मान्तरण को राष्ट्रान्तरण मानते थे। आप कहते थे "यदि कोई व्यक्ति धर्मान्तरण करके ईसाई या मुसलमान बन जाता है तो फिर उसकी आस्था भारत में न रहकर उस देश के तीर्थ स्थलों में हो जाती है जहाँ के धर्म में वह आस्था रखता है, इसलिए धर्मान्तरण यानी राष्ट्रान्तरण है।
इस प्रकार से प्राय: सभी देशभक्त नेता ईसाई धर्मान्तरण के विरोधी रहे है एवं उसे राष्ट्र एवं समाज के लिए हानिकारक मानते है। लेखक : डॉ विवेक आर्य


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मरने के बाद सेक्युलरों (seculars) का क्या होता है??? कहाँ दूसरा जन्म होता है???

रविवार, 4 मार्च 2018

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मित्रो ईसाईयों से जब भी बात करो ऐसे ही तार्किक चर्चा करो! और जब इनसे जवाब न मिले तो पीट दो! क्योकि इनकी औकात ही यही है!

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018
मित्रो ईसाईयों से जब भी बात करो ऐसे ही तार्किक चर्चा करो!
और जब इनसे जवाब न मिले तो पीट दो!
क्योकि इनकी औकात ही यही है!
सवाल:— ईश्वर (God) कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस मैरी का बेटा है ?
ईसाई:— हां।
सवाल:— तो फिर मैरी को किसने बनाया ?
ईसाई:— ईश्वर ने बनाया।
सवाल:— OK, तो फिर ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस का जन्म हुआ था ?
ईसाई:— हां, हुआ था।
सवाल:— तो जीसस के पिता कोन हैं ?
ईसाई:— जीसस के पिता ईश्वर है।
सवाल:— तो फिर ईश्वर कौन है?
ईसाई:— जीसस है!
सवाल:— क्या जीसस ईश्वर का सेवक है?
ईसाई:— हाँ है।
सवाल:— क्या जीसस सूली पर मरे थे?
ईसाई:— हाँ मरे थे।
सवाल:— जीसस को पुनर्जीवित किसने किया ?
ईसाई:— ईश्वर ने किया।
सवाल:— क्या जीसस दूत (संदेशवाहक) थे?
ईसाई:— हाँ थे।
सवाल:— तो उनको पृथ्वी पर किसने भेजा था ?
ईसाई:— ईश्वर ने भेजा।
सवाल:— तो ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या जीसस ने धरती पर किसी की पूजा की थी?
ईसाई:— हाँ।
सवाल:— किसकी पूजा की थी ?
ईसाई:— ईश्वर की।
सवाल:— तो ईश्वर कौन है ?
ईसाई:— जीसस है।
सवाल:— क्या ईश्वर का कोई प्रारम्भ है?
ईसाई:— नही है।
सवाल:— तो 25 दिसम्बर को कौन जन्मा था?
ईसाई:— जीसस जन्मे थे।
सवाल:— क्या जीसस ही ईश्वर है?
ईसाई:— हाँ जीसस ही ईश्वर है।
सवाल:—तो ईश्वर कहाँ है ?
ईसाई:— स्वर्ग में है।
सवाल:— स्वर्ग में कितने ईश्वर हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक ही ईश्वर है।
सवाल:—जीसस कहाँ है ?
ईसाई:— वो अपने पिता (ईश्वर ) के दायीं तरफ विराजमान है!
सवाल:— तो स्वर्ग में कितने ईश्वर हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक ही ईश्वर है।
सवाल:— वहां पर कितनी कुर्सियां हैं ?
ईसाई:— वहां सिर्फ एक कुर्सी है।
सवाल:— जीसस कहाँ है?
ईसाई:— वे ईश्वर के पास बैठे हैं।
सवाल:— तो वे दोनों एक कुर्सी पर कैसे बैठ सकते हैं?
ईसाई:— ईश्वर पर इतने सवाल ?
आपको शैतान ने गुमराह कर रखा है ईश्वर के बारे में इतना गलत सिर्फ शैतान ही सोच सकता है!
आप शैतान के जाल में फंसे हुए हैं!
क्या मजाक है BC!
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ईसाइयत एक मूर्खता या अंधविश्वास ???

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018
इसाई लोग कहते है .. सारी दुनिया  आदम और ईव के बच्चो से शुरू हुई ... उनके सिर्फ तीन लड़के थे ... तो इन लडको ने दुनिया  कैसे  बनाई  बिना  लड़की के ?....अगर इनकी कोई बहन भी होती .. तो भी  यह बात  बहुत  ही गलत है .... जरा सोचो
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How are Missionaries Dangerous to Bharat?

सोमवार, 15 जनवरी 2018

How are Missionaries Dangerous to Bharat?


(This question originally appeared on Quora and we are reproducing the answer by Jeyo Sargunam)

Dear Seeker,

My name is Jeyo Sargunam…. and i was a Missionary…..wannabe.

Back Story – My ex-life as a Quasi Missionary

I come from a hard line Christian family and our family have done a decent job of producing Christian priests & missionaries over the last few generations. We have had 3 Bishops & a dozen christian preachers in our lineage. Since my teen i started drifting more & more toward hard-line Christianity and for obvious reasons my local environment was very conductive for my drift. I used to organize rallies, conduct church revival meetings, organize the youth & have outreach mission where you will expose the concept of Christ to poor people.

So basically i was not the affected party, however was the perpetrator as a quasi missionary.

Life had some other plans:

I had convinced my self that i will attend bible school and start my life as a missionary. However Life is funny in its own way. Thanks to an altercation at my church I ended up shipwrecking my faith in Jesus Christ. I prayed my last prayer on 25th April 2005 at 5:30 AM and renounced Christianity.

DNA of a Missionary organization

  • Believer greater than 'Non Believer': People who don't have faith in Jesus are looked down upon. As if you have some disease that needs to be fixed. Some times it is very outright, however most of the time it is very subtle. This is the reason people act "holier than thou"
  • Missionaries are well a oiled marketing machine: Believe me, every missionary on field is properly trained on how to approach, present & influence a non believer (mostly Hindus) toward Christianity. They go through extensive training and coaching.
  • They have targets: Just like any corporate organization, they also have targets. Just like how a sales call center focus on conversion, these poor missionaries have targets for conversion…. oops .. to put in a polished way .. to get them redeemed by Lord & Savior Jesus Christ.

They are well funded: You cannot beat the Christian setup. It is well rooted and well funded. Most of these organizations are decades old and have good assets and money. They can outspend any other Ghar Wapsi gimmick that RSS can try.

Yes, Missionaries are dangerous

  • It is like a virus: They target people who are either poor or emotionally vulnerable. This is wrong at every level as people who need comfort & love…. get manipulated toward Christianity. Sometimes this process takes years to complete; however like a virus, once affected it will slowly start taking control.
  • They manipulate: It is no surprise that in Tamil, the holy bible is called Vedam, Christian priest is called Iyer. Church is called Kovil. Such dilutions were done so that they can attract and make Christianity more acceptable.
  • They pollute & destroy local cultures to their advantage. Local cultures are slowly displaced and replaced. For Example: Gurukul method of teaching.
  • They preach hatred in a very subtle way. They always teach about "us" and "them. They teach to ' tolerate' however never to 'accept'.
  • Screw every one in the name of secularism: Till the time they are converting, it is ok…the day they have resistance, they will play the secularism and minority card. For example, thousands of Hindu temples have been desecrated, however if one church got desecrated….it will become a symbol of oppression by the majority.

Missionaries

The slow destruction of Bharat's culture, values and current life can all be traced back to the moral decadence bought by Missionaries. You will see this patterns repeat in Africa, Americas, Australia in the last 500 years where missionaries tried to replace a pluralist society with a religion that is one size fit all.

Looking back i am not proud of what i did…. however thank god (whoever it may be) that i am not a Missionary however ……only like the missionary position.

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क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर(भोसडीवाले) !

रविवार, 24 दिसंबर 2017

क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर !


  क्रिसमस पर नकली पेड़ पर बल्ब टांगकर अपनी आधुनिकता का परिचय देते है दोगले सेक्युलर ! जी हां हम सभी बात कह रहे है, देश के सेक्युलर और वामपंथी हिन्दुओ से इतनी नफरत करते है, जिसका कोई भी हिसाब नहीं है, ये हर हिन्दू त्यौहार, हर हिन्दू रीति रिवाज का विरोध करते है, उसकी बुराई करते है, ऐसा ये इसलिए करते है ताकि हिन्दुओ के मन में हीन भावना आ जाये, और वो अपने ही धर्म से नफरत करे


ऐसा करने से ये वामपंथी मिशनरियों और जिहादियों के साथ मिलकर भटके हिन्दू को आसानी से धर्मांतरित कर सकते है, और इसी कारण हिन्दू रीति रिवाजों और त्योहारों के खिलाफ ये आये दिन जहर उगलते है, हिन्दू तुलसी की पूजा करते है, तुलसी का सम्मान करते है, तो ये सेक्युलर उसे अन्धविश्वास बताते है 

आपको बता दें की तुलसी बहुत ही चमत्कारी पौधा है, विज्ञान की दृष्टि से भी उसमे काफी गुण है, तुलसी के अनेकों उपयोग है, बहुत काम का पौधा है, हिन्दू इसका सम्मान करते है, तुलसी का पौधा बरगद की तरह ही, पीपल की तरह ही 24 घंटे ऑक्सीजन देता है, हिन्दू तुलसी के नीचे दिया जलाते है, कुछ हिन्दू घी का दिया जलाते है. इसे वामपंथी और सेक्युलर तत्व घोर अन्धविश्वास बताते है, इसका विरोध करते है 

पर ये तमाम सेक्युलर, तमाम वामपंथी हर साल 25 दिसंबर को एक नकली पेड़ को खरीदकर लाते है, या नहीं भी लाते तो उसका समर्थन करते है, उसे ये सेक्युलर क्रिसमस ट्री कहते है, वो कटा हुआ पेड़ होता है, या फिर पूरा ही नकली प्लास्टिक का पेड़ होता है, जिसमे  सबकुछ नकली होता है, उस पौधे में ये सेक्युलर सैंकड़ो बल्ब और न जाने क्या क्या लगाते है, और प्रार्थना करते है, हिन्दू तुलसी के नीचे दिया जलाये तो हिन्दू अंधविश्वासी है, परन्तु ये लोग नकली पेड़ पर बल्ब टांग  अपनी आधुनिकता का परिचय जरूर देते है 
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